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गुरुवार, 16 अक्तूबर 2008

लघु कथा- साहित्य में डब्ल्यू डब्ल्यू एफ

साहित्य में डब्ल्यू डब्ल्यू एफ
0प्रेम जनमेजय


एक समय था जब मनोरंजन के साधन कम थे और लोग मुर्गे, तीतर, बटेर आदि लड़वाया करते थे तथा सामान्य जन उन्हें बड़े चाव से देखता। मुर्गे, तीतर, बटेर आदि विशिष्ट जनों के पास ही हुआ करते थे और उन्हें पालने का दम भी उन में था। वे पैसा फेंकते और तमाशबीनों को तमाशा देख प्रसन्न होते। गली- गली उनके मुर्गे, तीतर, बटेर आदि की चर्चा होती। यह चर्चा सामान्य जन करता। और सामान्य जन की चर्चा ? वो किस खेत की मूली होता है हुजूर, आपको पता चले तो बताइएगा, थोड़ी हम भी खरीद लेंगें।
धीरे-धीरे- सामान्य जन के मनोरंजन के साधन बढ़ने लगे। डब्ल्यू डब्ल्यू एफ जैसे अत्याधुनिक खेल बाजार में आ गए। बाजारवाद ने सामान्य जन की जेबों में कुछ पैसा डाला और अपने मनोरंजन के साधनों का नशेड़ी बना लिया। मुर्गे, तीतर, बटेर आदि बेरोजगार हो गए। उधर नवाबों की नवाबी भी चली गई। बिना लड़े मुर्गे, तीतर, बटेर आदि को अपना जीवन व्यर्थ बहा-बहा लगने लगा और ‘वे दो सरस पद भी न हुए, अहा!’ कह कर आंसू बहाने लगे। वे बुढ़ा भी गए थे और बूढ़ों को इस समाज में जिस दृष्टि से देखा जाता है उसे उपेक्षा की दृष्टि कहते है। अपने उपर विशिष्ट दृष्टि डलवाने के लिए लहू लुहान तक हो जाने वाले मुर्गे, तीतर, बटेर आदि कैसे इस उपेक्षा-दृष्टि को सह सकते हैं।
सुना है अब ये सारे बुढ़ा चुके मुर्गे, तीतर, बटेर आदि साहित्य में आ गए हैं और डब्ल्यू डब्ल्यू एफ की तर्ज पर बिना लहू-लुहान हुए लड़ने की नौटंकी कर रहे है। इस नौटंकी से वे विवादाग्रस्त होते हैं और समाचार में रहने का सुख पाते हंै।

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6 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बुढ़ा चुके मुर्गे, तीतर, बटेर आदि को खेमेबाजी की वियाग्रा की लत लग गई है...और उसी की उछलन दिखाई पड़ रही है, भाई साहब!!! आपने बहुत सही आंका!! बधाई देता हूँ.

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

अहा सुन्‍दर।
साहित्‍य में डब्‍ल्‍यू डब्‍ल्‍यू एफ
व्‍यंग्‍यकार के नये नजरिये की
देनी पड़ेगी अवश्‍य ही दाद
पर इस दाद के इलाज के लिए
दवा खरीदनी होगी खुद आज।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

हमें तो कोई मुर्गा तीतर बटेर बेरुजगार ना मिला। ।

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

सही है.

लेकिन ये मुर्गे कटने के लिए ख़ुद को समर्पित नहीं करते. सुबह-सुबह बांग देकर निकल लेते हैं. तीतर के केस में तो पुरानी पहेली अभी तक चल रही है. अरे वही, तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर वाली. रही बटेर की बात तो साहित्य को चलाने वाले न जाने कितने अंधे उकड़ू बैठे रहते ही हैं. बीच-बीच में हाथ फट से आगे कर देते हैं. बटेर उनके हाथों से जा चिपकते हैं.

कमल शर्मा ने कहा…

वाह, सभी पोस्‍ट खूब अच्‍छी है और कुछ न कुछ सीख भी मिलती है। व्‍यंग्‍य मुझे खूब पसंद है लेकिन आपके ब्‍लॉग पर पहली बार आया अविनाश वाचस्‍पति जी के बताने से।

सृजनगाथा ने कहा…

बधाईयाँ