पिछले माह पृष्ठ देखे जाने की संख्या

रविवार, 13 मार्च 2016

‘व्यंग्य यात्रा’ अंक 45

‘व्यंग्य यात्रा’ के अंक 45 का प्रकाशन  हो गया है।इस अंक का मुख्य पृष्ठ कुंवर रविंदर की कलाकृतिपर आधारित है। 



इस अंक में आप पढ़ सकते हैं-
पाथेय में- श्रीलाल शुक्ल, रवींद्रनाथ त्यागी, महीप सिंह की रचनाएं। प्रताप सहगल का महीप सिंह पर संस्मरण
चिंतन में- ‘समकालीन यथार्थ और व्यंग्य’ पर गौतम सान्याल, सूरज प्रकाश, सूर्यबाला, प्रेम जनमेजय, लालित्य ललित एवं सुमित प्रताप सिंह तथा निर्मिश ठाकर का व्यंग्यचित्रों एवं रतिलाल बोरीसागर अर्वाचीन गुजराती हास्य व्यंग्य साहित्य पर आलेख। मनोज मोक्षेंद्र का ‘सार्थक व्यंग्य’ पर चिंतन।
मुंबई में हिंदी व्यंग्य का परिदृश्य- के अंतर्गत - करुणाशंकर उपाध्याय, अनंत श्रीमाली एवं सुमितप्रताप सिंह की रपट। यज्ञ शर्मा, सूर्यबाला, अक्षय जैन,घनश्याम अग्रवाल, संजीव निगम, हस्तीमल ‘हस्ती’, कैलाश सेंगर, राजेश विक्रांत, सुभाष काबरा, महेश दुबे, मधुकर गौड़, रोहित शर्मा, सूरज प्रकाश, वागीश सारस्वत, अलका अग्रवाल सिगतिया की व्यंग्य रचनाएं। यज्ञ शर्मा पर विशेष सामग्री कें अंतर्गत - राजेन्द्र सहगल, मधु अरोड़ा, राजेश विक्रांत, दिनेश बावरा, अनंत श्रीमाली एवं सुभाष काबरा। सूर्यबाला के व्यंग्य लेखन पर अरुणेन्द्र नाथ वर्मा का आलेख।
गुजराती व्यंग्य साहित्य के अंतर्गत विनोद भट्ट, निर्मिश ठाकर एवं बोरीलाल सागर की रचनाएं।
त्रिकोणीय में- व्यंग्य उपन्यास ‘अक्कड़-बक्कड़’ पर सुभाष चंदर का आत्मकथ्य। प्रेम जनमेजय, हरीश नवल, सुशील सिद्धार्थ एवं अकबर महफूज के आलेख। ‘अक्कड़-बक्कड़’ का एक अंश।
गद्य व्यंग्य रचनाओं में-शंकर पुणतांबेकर , दिलीप तेतरवे, हरीश नवल, श्रवण कुमार उर्मलिया, किशन लाल शर्मा, निर्मल गुप्त, हरीशकुमार सिंह, सुधा ओम ढींगरा, शम्भु पी. सिंह, नवल जायसवाल , विनोद साव, विश्णु स्वरूप श्रीवास्तव, अशोक मिश्र की रचनाएं।
पद्य व्यंग्य रचनाओं में- दिविक रमेश , ओम वर्मा, संदीप राशिनकर ,श्रीति राशिनकर, मनोकामना सिंह अजय, विज्ञानव्रत, अनिरुद्ध सिन्हा ,दलजीत कौर, कृष्ण कुमार यादव, कुंवर प्रेमिल, सूर्यनारायण गुप्त, मीना अरोड़ा एवं अमृतलाल मदान की रचनाएं।
‘इधर जो मैने पढ़ा’- में ‘मालिश महापुराण’ पर प्रेम जनमेजय, ‘सपनों के सहारे देश’ पर शरद उपाध्याय तथा ‘भूतपूर्व का भूत’ पर अरविंद तिवारी।

शुक्रवार, 26 जून 2015

' व्यंग्य यात्रा ' का 43 वां अंक - 'राग व्यंग्य विमर्श '

मित्रों ,
' व्यंग्य यात्रा ' का 43 वां अंक - 'राग व्यंग्य विमर्श ' प्रेस में चला गया है। इसका मुख्य कवर प्रसिद्द चित्रकार एवं कवि ,केनेडा निवासी , मंजीत चात्रिक की कलाकृति पर आधारित है।
इस अंक में
पाथेय में: 
गोपालप्रसाद व्यास पर रामशरण जोशी, कैलाश वाजपेयी पर दिविक रमेश,
कृष्णदत्त पालीवाल पर हरीश नवल एवं अवधनारायण मुद्गल पर महेश दर्पण
चिंतन मेंः
व्यंग्य तज़मीन - निर्मिश ठाकर। ‘व्यंग्य का मेरा सच’ शिवशंकर मिश्र
जबलपुर में राग व्यंग्य विमर्श
कुंदनसिंह परिहार, रमेश सैनी,रमाकांत ताम्रकर, श्रीकांत चौधरी , संतोष खरे
गंगाचरण मिश्र, आचार्य भागवत दुबे,श्रीराम ठाकुर दादा, अनामिका तिवारी
रामानुज लाल श्रीवास्तव,उपेन्द्र शर्मा,अभिमन्यु जैन,मनोज कुमार शुक्ल ‘मनोज’ प्रभात दुबे,
साध्ना उपाध्याय, सुधरानी श्रीवास्तव, कुंवर प्रेमिल, गुप्तेश्वर द्वारका गुप्त, -विवेक रंजन श्रीवास्तव
त्रिकोणीय में ज्ञान चतुर्वेदी का
व्यंग्य उपन्यास ‘हम न मरब’
प्रभाकर श्रोत्रिय, प्रेम जनमेजय,दिलीप तेतरवे एवं विवेक मिश्र
गद्य व्यंग्य रचनाएं में
शंकर पुणतांबेकर, हरि जोशी, वेदप्रकाश अमिताभ,श्रवण कुमार उमर्लिया, उर्मि कृष्ण
प्रदीप चैबे, मधुसूदन पाटिल, असीम कुमार आंसू, अकबर रिजवी,अलका अग्रवाल सिगतिया,
सुधेश, सुरेश धींगड़ा रामदेव धुरंधर, सूर्यकुमार पांडेय, रामबहादुर चैधरी ‘चंदन’, अभिषेक अवस्थी,
कुलविन्दर सिंह कंग, इन्द्रजीत कौर, मंगल कुलजिन्द, शरद तैलंग, रमाकांत शर्मा, -प्रदीप शशांक
सुभाष काबरा, संजीव निगम, प्रहलाद श्रीमाली, ओमप्रकाश सारस्वत, नीलाभ कुमार, अम्बिका दत्त आदि
पद्य व्यंग्य रचनाएं में
राजरारायण बिसारिया, नरेश शांडिल्य, प्रेमशंकर रघुवंशी, मनोहर पुरी सुभाष रस्तोगी, जयगोपाल मदान
प्राण शर्मा, शिवानंद सहयोगी आरती स्मित, पं. गिरिमोहन गुरू, लोक सेतिया
इधर जो मैंने पढ़ा में
विभारानी, कुलदीप तलवार, सुनीता शानू की कृतियों पर प्रेम जनमेजय एवं सुशील सिद्धार्थ

रविवार, 14 सितंबर 2014

' हिंदी उत्सव ' के ' सुअवसर' पर

मित्रों , कल ' हिंदी उत्सव ' के ' सुअवसर' पर  एक टी वी चैनल में , अनेक भौंडे सौंदर्य प्रसाधनो से सजाकर बाजार में बैठायी गयी हिंदी  के 'शुभचिंतक ' उसके हर ठुमके पर  वाह ! वाह !  कर रहे  थे और करवा रहे थे।  गुलशन नंदा , प्यारेलाल आवारा , ओम प्रकाश शर्मा की  गदगदायी  एवं महावीर प्रसाद द्विवेदी , रघुवीर सरीखी सर पीटती, आत्माएं  विचरण कर रही थी। देख मूर्ख बालक ,बाज़ारू हिंदी ने मुझे कितना दिया , तूं भी हठ छोड़ और मेरे साथ हिंदी के ठुमको की प्रशंसा कर. और देख हिंदी का असली नृत्य यह है , तूं कहाँ शास्त्रीयता के मोह में  फंसा है।  रामू  चल उठ मेरे  साथ चल , और हिंदी को सुन्दर 'रेपर' में  लिपटी  आकर्षक वस्तु  बना और उसे बेच।  तूं  तो चेनई एक्सप्रेस बना  और करोडो कमा , कहाँ दो बीघा ज़मीन, कागज़ के फूल , जागते रहो आदि के  चक्कर में फंसा है। देख तो सही हिंदी का वितरक क्या  कह रहा है -- जो बाजार का इस्तेमाल  कर रहे हैं वही बाजार को गाली  दे रहे हैं  हैं। बाजार ने हमारी झोली भर दी है और मूर्ख उसे गाली  दे रहे हैं। ' हे मूर्ख तूं क्यों समर्थ को गाली दे  रहा है, तेरा जन्म   तो गाली खाने के लिए हुआ है।  समरथ को  कहाँ दोष गोसाईं !   एक कायर -सा क्यों  किसी झोपड़ी में डरा बैठा है और अपने साथ अपनी बूढ़ी  हो चुकी माता को चिपकाये है।  तूं  तो अति सुन्दर , आकर्षक सौतेली माता के पांच सितारा 'सहवास' का आनंद उठा। तूं हिंदी में बेस्ट सेलर रच। तूं तो हमको हिंड्डी नहीं आता , हमारा हिंड्डी अच्छा नई , कहकर गौरवान्वित हो , काहे  यह कहकर शर्मिंदा  होता है कि  तुझे अंग्रेजी भाषा नहीं आती , कि तुझे सरल अंग्रेजी चाहिए, कि  तूं मातृ  भाषा का मास्टर है।      
मित्रों सच ही मुझ जैसे अनेक कायर लादी गयी इस बाजार व्यवस्था का इस्तेमाल करने को विवश हैं , और  इससे 'डर ' कर न केवल सावधान हो रहे हैं अपितु अपनी संतान को भी सावधान कर रहे हैं।    हम बाज़ारू हिंदी की प्रगति के बाधकों के अपराध निश्चित  अक्षम्य हैं। हम अभी भी भाषा को अपनी संस्कृति और साहित्य का वाहक माने  पुरातन मूल्यों से चिपके हैं। 

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

 ' व्यंग्य यात्रा ' एक दशक की यात्रा के अंतिम पड़ाव पर है।'शरद जोशी एकाग्र का दूसरा पड़ाव' अंक 39 '

व्यंग्य -बरसात ने दिल तोड़ दिया ...

बरसात ने दिल तोड़ दिया ...

व्यंग्यकार को संपादक जी का फोन आया - हमारे लिए बरसात पर कुछ लिख दीजिए।’
वैसे तो व्यंग्यकार कलम हाथ में गहे , कागद समक्ष रखे तैयार रहता है कि कब संपादक उससे अनुरोध करे और वह तत्काल कुछ भी लिख भेजे। पर व्यंग्यकार तो सन्न था। उसके लिए, बरसात पर कुछ लिख दीजिए जैसा अनुरोध ऐसा ही था जैसे किसी भ्रष्टाचारी से बिना सेवा शुल्क लिए काम करवाने का अनुरोध अथवा हमाम के नंगों से कपड़े पहनकर नहाने का अनुरोध। माना कि व्यंग्यकार तत्काल लिखने में माहिर होता है, रोजाना लिख सकता है पर बरसात जैसे ऐरे- गैरे विषय पर...? व्यंग्यकार तो देश की राजनीति पर ‘गहरी’ व्यंग्यात्मक टिप्पणियां कर सकता है, देश के सेवकों के कैरिकेचर खींच सकता है, टी वी चैनलों की तरह ब्रेकिंग न्यूज को पकड़ कर उसकी चीर फाड़ कर सकता है- बरसात जैसा विषय कोई आधुनिक है ? बरसात पर या तो कवि कलम घिसते हैं या फिर फिल्मी गीतकार... व्यंग्यकार तो नए-नए ताजा विषयों पर अपनी कलम चलाता है, समाज को मार्ग दिखाता है। इतिहास गवाह है कि संपादकों ने भी होली, दिवाली जैसे विशेषांको में व्यंग्यकार को लिखने के लिए कहा है, बरसात, प्रेम विशेषंाक, सैक्स विशेषांक आदि पर नहीं।
इस कारण व्यंग्यकार ने संपादक को एक खुला पत्र लिखा। आप भी पढ़ें।
‘‘प्रिय संपादक
क्या आपको लगता नहीं है कि आप एक व्यंग्यकार के साथ नाइंसाफी कर रहे हैं। एक व्यंग्यकार से उम्मीद कर  रहे हैं कि वह बरसात पर कुछ लिखे। बरसात पर तो कुछ नहीं, बहुत कुछ कहना अधिकांश कवियो / कवयित्रियों / फिल्मी गीतकारों का कॉपीराईट है। बरसात होते ही उनका मन मयूर नाचने लगता है। व्यंग्यकार के मन मे तो चीता होता है जो शिकार देखते ही झपटता है। व्यंग्यकार तो बरसात को देखकर सोचता है कि गड्डों जैसी सड़कों पर पानी भर गया तो वह दफतर कैसे जाएगा। जो सड़क टूटी है उसके ठेके में किसने कितना खाया है। और फिर आपको उम्मीद ही करनी है तो मुंबई के यज्ञ शर्मा जैसे व्यंग्यकारों से करे। दिल्ली में बरसात तो समाज में बची नैतिकता-सी होती है। मैं मुंबईकर नहीं दिल्लीकर हूं, दिल्ली जो भ्रष्टाचार, बलात्कार आदि का केंद्र है। मैं तो नैतिकता, ईमानदारी जैसे सूखे के बारे में ही कुछ कह सकता है। मैं तो  छह बरस की बच्ची हो या साठ बरस की बुढिया, उसके साथ हुए बलात्कार के बारे में कुछ कह सकता हूं, जो बरसात की तरह बरसते हैं। बरसात का तो मौसम होता है, दिल्ली में भ्रष्टाचार, बलात्कार आदि का कोई मौसम नहीं होता, ये तो आम दिन की बात है।  मैं तो आम आदमी का लेखक हूं , आम दिन की बात कही कहूंगा इसलिए हे संपादक, मुझसे कोई उम्मीद न करें तो अच्छा। उम्मीद पर दुनिया जीती है तो उम्मीद के कारण मरती भी है। आपने उत्तराखंड की आपदा से लगता है कुछ नहीं सीखा। सीख जाते तो अनाप-शनाप उम्मीद नहीं करते।
अभी उस दिन झोपड़पट्टी के पास से गुजरा तो यह सुनने को मिला-
हम तो समझे थे कि बरसात में  बरसेगी शराब
आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया।
अब भईए, झोपड़पट्टी में बरसात को बुलाओगे तो दिल टूटेगा ही। शराब बरसानी है तो उसे किसी किंग.. के यहां बुलाओं, किसी आई पी एल शाई पी एल में बुलाओ जहां शराब तो क्या शबाब भी खूब बरसता है। वहां बरसात दिल तोड़ती नहीं जोड़ती है। व्यंग्यकार से उम्मीद मत करो, वो तो लोगों के दिल तोड़ता है। टूटे दिल पर आंसू बहाना, विरहिणी के दुख का लोमहर्षक चित्रण करना व्यंग्यकार का काम नहीं। उसके पास तो स्तंभ लिखने जैसे अनेक महत्वपूर्ण काम है।
    इसलिए गलत उम्मीद न करें ं। अब आप उम्मीद करें कि हमाम में कपड़े पहनकर जाएगे और शर्म नंगों को आएगी तो गलत है। हमाम में तो कपड़े पहनने वाले को ही शर्म आती है।  नंगे से खुदा भी डरता है और इसलिए खुदा हमाम में नहीं मिलता है। सरकार भी एक तरह का हमाम है जिसमें जाते ही अच्छे से अच्छा कपड़े पहनने वाला नंगपन दिखाने लगता है। यही कारण है कि जो भी सरकार बनती है, वह कपड़े उतार देती है। आप उम्मीद करते हैं है कि इस पार्टी की सरकार ने घोटाले कर कर के कपड़े उतार दिए हैं और दूसरी आएगी और वो ये नंगपन नहीं करेगी, तो आप गलत उम्मीद करते हैं।
हे संपादक मैं तो मैं तो भवानीप्रसाद मिश्र से क्षमा याचना सहित कह सकता हूं--
जी हां हुजूर मैं व्यंग्य लिखता हूं /मैं तरह- तरह के व्ंयग्य लिखता हूं /पर बरसात पर व्यंग्य नहीं लिखता हूं।
बरसात पर तो वे लिखते हैं/जो टर्र-टर्र करते हैं? कूंए मेें रहते हैं /मैं तो न कूंए का हूं ,न ही चुनाव का हूं जो मौके पर ही टर्राउं/ फिर अपनी टर्राहट भूल जाउं।
इसलिए हुजूर मैं बस व्यंग्य लिखता हूं /मैं तरह -तरह के व्यंग्य लिखता हूं।
बरसात प्रेमिका की तरह बरसे तो फुहार लाती है। पत्नी की तरह बार-बार बरसे तो बाढ़ लाती है/
मैं न तो प्रेमिका हूं और न ही पत्नी ।
हुजूर मैं तो बस व्यंग्य लिखता हूं तरह तरह के व्यंग्य लिखता हूं।’
 संपादक ने लौटती डाक से लिखा-
हे प्रिय व्यंग्यकार, चुनाव पास आने को हैं, लगता है तुम भी ‘आम आदमी’ की बात करते-करते आम आदमी की तरह चुनाव लड़ने वाले हो। चुनाव के लिए पहला पाठ तुमने पढ़ ही लिया है। दोगली बातें करने लगे हो। कहते हो बरसात पर व्यंग्य नहीं लिखता और हमें ही बरसात पर व्यंग्य पेल  गए।’ 
व्यंग्यकार ने लिखा --अब मैं क्या कहूं?  मैं तो इतना ही कह सकता हूं मेरे संपादक -
आपको प्यार है कि मुझसे नहीं है मुझसे
जाने क्यों ऐसे सवालात ने दिल तोड़ दिया ।
0000000000000000000

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

अप्रकाशित उपन्यास अंश --प्रभु रचि राखा


सूर्यवंशी राजा राम के राज्य में सूर्य उल्लास की किरणो से पूरी अयोध््या को आलोकित कर रहा है। सूर्य अस्ताचल की ओर जाते समय यह दायित्व चंद्र को सौंप जाएगा जिससे कोई भी क्षण उल्लास विहीन न हो।
अयोध््या में राम -राज्य स्थापित हो चुका है। राम राज्य की यह स्थाप्ना वैसी नहीं है जैसी कि लंका में हुुई है। अयोध््या में तो सत्ता का हस्तांतरण हुआ है। लंका में तो विजय के उपरांत नृप विभीषण ने सत्ता ‘संभाली’ है जबकि अयोध््या तो थी ही राजा राम की । अयोध््या तो अनेक वर्षों से प्रतीक्षारत थी कि राजा राम आएं और जिस अयोध््या को वे रोता बिलखता छोड़ गए थे उसके मुख पर मुस्कान दें। व्यक्ति को जब उसका बहु प्रतीक्षित मिल जाता है तो उसका उल्लास चर्मसीमा पर पहुंच जाता है। उल्लास की चर्मसीमा... उल्लास का अतिरेक... समय जैसे ठहर जाता है... चारों ओर वसंत ही वसंत...वसंत भी ठहर जाता है क्या?
प्रभु कृपा से सब संभव है।
पूरी अयोध््या आलोक से उल्लसित है। बहुत कम अवसर होते हैं जब समान रूप से राजभवन और प्रजा के ‘भवन’ लगभग एक जैसे आलोकित होते हैं। राजभवनों में जब प्रसन्नता का अतिरेक होता है तो वह अपने उल्लास को अपनी प्रजा के साथ बांट लेता है।
ऐसा प्रभु की कृपा से होता है।
मन उल्लसित हो तो वो कोई प्रश्न नहीं करता है। इस समय पूरी अयोध््या उस भक्त के मन की तरह उल्लसित थी जिसे उसके प्रभु के दर्शन हो गए हैं। भक्त को प्रभु के दर्शन हो जाएं और प्रभु समक्ष हों तो प्रश्न कहां उठते हैं? उल्लसित मन अपने कटु वर्तमान को नेपथ्य में रखकर सुखद भविष्य के स्वप्न देख उल्लसित होता है। श्रीराम का अयोध््या आना एक इंद्रध्नुषी, आशावना स्वप्न की रचना रच गया है, जिसके प्रति विश्वास है कि यह स्वप्न शीघ्र ही यथार्थ में परिवर्तित होगा।
इसलिए संपूर्ण अयोध््या उल्लास में डूबी है।
ऐसा प्रभु की कृपा से होता है।
ऐसे ही उल्लसित दो सेवक, संध््या समय, अयोध््या के राजभवन के गलियारे में मिलते हैं। दोनों समव्यस्क हैं। दोनों के मुख उल्लास से ऐसे ही खिले हुए हैं जैसे कमल। नहीं नहीं ,कमल नहीं, क्योंकि कमल तो कीचड़ में खिलता है और न तो अयोध््या का राजभवन कोई कीचड़ है और न ही उनका शरीर कीचड़ है। उनके मुख तो चंद्र के समान खिल रहे हैं। अमावस्या की रात में पूर्ण चंद्र के समान। यह उपमा भी उचित नहीं है क्योंकि यह उपमा तो विभीषण जी को ही दी सकती है। वही लंका में छायी अमावस्या में किसी चंद्र की तरह खिले हुए हैं। अब पूर्ण चंद्र की तरह खिले हुए हैं, अर्द्ध्रचंद्र की तरह अथवा दूज के चंद्र की तरह, ये तो विभीषण जी ही जाने। पर इतना अवश्य है कि पूरी लंका में यदि किसी का मुखमंडल खिला होना चाहिए या पिफर खिला हुआ दृष्टिगत होना चाहिए, वो विभीषण जी का ही होना चाहिए। ;हे लेखक ! उल्लसित अयोध््या में अमावसी लंका की चर्चा उचित नहीं है अतः तूं उपमा का त्याग कर एवं सीध्े-सीध्े अयोध््या के उन दोनो उल्लसित सेवकों द्वारा की गई वार्ता का सीध्ी भाषा में वर्णन कर।द्ध
‘जय श्रीराम, मित्रा हितचिंतक !’
‘जय श्रीराम, मित्रा निष्कंटक !’
‘ बहुत दिनों बाद तुमने दर्शन दिए, मित्रा!’
‘ तुमने भी उतने ही दिनों बात दर्शन दिए, मित्रा!’
‘ बहुत दिनों बाद हम लोग सक्रिय जो हुए हैं। जब से ‘हमारे’ लक्ष्मण जी आए हैं ,उनके हम जैसे विश्वासपात्रा अध्कि सक्रिय हो गए हैं। कब प्रातः होती है और कब संध््या होती है, पता ही नहीं चलता।’
‘ मित्रा, मुझे तो इस सक्रियता में बहुत आनंद आ रहा है।’
‘मुझे तो यह देखकर भी आनंद आ रहा है कि जो चौदह वर्ष तक सक्रिय होने का दंभ पाल रहे थे वे किसी अजगर से चाकरी रहित, निष्क्रिय हो गए हैं।’
‘यह सब प्रभु इच्छा का परिणाम है मित्रा!’
 हितचिंतक कुछ रुक कर, इध्र-उध्र दृष्टि घुमाकर, सावधनीपूर्वक कहता है, ‘मित्रा, मैंने अपनी ही नहीं, तुम्हारे और अपने परिवार की सक्रियता के साध्न का भी प्रबंध् कर लिया है।’
‘कैसा प्रबंध्, मित्रा हितचिंतक ?’
‘ तुम्हें तो राजभवनों की गतिविध्यिों एवं व्यवस्था का विशाल अनुभव है। जानते ही हो कि अपने हित की चर्चा सार्वजनिक स्थलों पर नहीं की जातीं ?’
‘ पर इस समय तो सभी उल्लास में डूबे हैं मित्रा! इस उल्लास में किसे चिंता है कि कोई क्या कर रहा है। किसी को हमारी चर्चा से क्या?’
‘ यह पुराना शासनकाल नहीं है मित्रा! यह सक्रिय- काल है। मान्यवर लक्ष्मण की देखरेख में पूरी व्यवस्था सक्रिय हो गई है। प्रजा को उल्लास में डूबने का पूरा अवसर इसलिए ही दिया जा रहा है, जिससे वो प्रशासन में किए जा रहे परिवर्तनों को लक्षित न कर सके, कोई प्रश्नचिह्न न लगा सके। उल्लास में डूबा मन बड़े से बड़े प्रश्न को टाल जाता है। तुम तो जानते ही हो कि मैं मान्यवर लक्ष्मण का कितना विश्वासपात्रा हूं...इसलिए मुझपर संदेह कठिनाई से होगा। मेरा भेद लेने का प्रयत्न करना कठिन होगा। पर इतना भी जानते हो कि प्रशासन में कोई विश्वासपात्रा नहीं होता है। इसलिए सावधन मित्रा!’
‘ तुम्हारी बातें...मेरा मन उत्सुकता से भरा जा रहा है, कुछ संकेत तो करें मित्रा!’
‘ संकेत इतना भर है कि मैंने राजा विभीषण के एक विश्वासपात्रा से मित्राता कर ली है। उसे पता है कि मैं मान्यवर लक्ष्मण जी का विश्वासपात्रा हूं। अब हम लंका तक... समझ गए। नहीं समझे तो अभी न ही समझो तो अच्छा है, क्योंकि...’  सामने से किसी सेवक को आता देख खिलखिलाता है।
‘ क्योंकि मैं तुम्हारे बचपन का मित्रा हूं, मैं तो यह भी जानता हूं कि तुम किस दिन कौन से रंग का अधेवस्त्रा धरण...’ खिलखिलाता है।
‘ और हम दोनो की दृष्टि इतनी तीक्ष्ण है कि हम दोनो सामने वाले के अधेवस्त्रा...’
यह कहकर दोनो खिलिखिला उठे। निश्चिंत मन अपनी प्रसन्नता में छोटी-सी बात पर भी खिलखिला उठता है। सावधन पाठकों,यह दोनो भी ऐसे ही खिलखिलाएंगे। हो सकता है इनका खिलखिलाना आपको अस्वाभाविक भी लगे। अपना मन चिंताओं में घिरा हो तो दूसरे का खिलखिलाना खलता भी है। मन कहता है- ये क्या खें खें कर रहा है।
‘ मेरा तो मन- मयूर नृत्य कर रहा है, मित्रा हितचिंतक!’
‘मेरा तो मन किसी वानर की तरह इस डाल से उस डाल पर नृत्य कर रहा है, मित्रा निष्कंटक!’
दोनो खिलखिलाते हैं।
‘ तुम्हारा मन किसी वानर की तरह नृत्य कर रहा है...’ खिल... खिल... खिल।
‘ और तुम्हारा मन किसी मयूर की तरह...’ खिल... खिल... खिल।
‘ तुमने किसी मयूर को नृत्य करते देखा है कभी?’
‘ हां, पर तुमने क्या किसी वानर को नृत्य करते देखा है ?’ खिल... खिल... खिल।
‘ देखा तो नहीं पर सब जानते हैैं कि एक वानर ने पूरी लंका को नृत्य करवा दिया था।’ खिल... खिल... खिल।
‘प्रभु श्रीराम की कृपा से।’
‘ और उसके पश्चात् विजयोल्लास में सभी वानरों ने नृत्य किया था। ’ खिल... खिल... खिल।
‘ प्रभु श्रीराम की कृपा से।’
‘इस समय भी वानर लंका में नृत्य कर रहे हैं ।’ खिल... खिल... खिल।
‘ प्रभु श्रीराम की कृपा से।’
‘ इस समय भी वानर पूरी लंका को नृत्य भी करवा रहे हैं।’ खिल... खिल... खिल।
‘ प्रभु श्रीराम की कृपा से।’
‘अब यदि हमारा मन -मयूर अथवा मन- वानर नृत्य कर रहा है तो...’
दोनो सम्मिलित स्वर में,‘ प्रभु श्रीराम की कृपा से।’
खिल... खिल... खिल।
‘कितने वर्षों उपरांत हमारे मन उल्लसित होकर नृत्य कर रहे हैं।’
‘ इस उल्लास ने हमारी अतीत की पीड़ा को विस्मृत कर दिया है।’
‘उल्लसित वर्तमान दुखदायक अतीत को विस्मृत कर देता है।’
निष्कंटक ने इध्र-उध्र देखकर सावधनीपूर्वक मद्धम स्वर में कहा ‘ बहुत दिनों बाद मिले हो मित्रा, हमें इस उल्लास का इंद्र -शैली में आनंद मनाना चाहिए।’
हितचिंतक के चेहरे पर भय नृत्य करने लगा। उसने भी इध्र-उध्र देखकर, सावधनीपूर्वक, मद्धम स्वर में कहा, ‘हर राजमहल की दीवारें कानों द्वारा निर्मित होती हैं मित्रा। राम-राज्य में इंद्र- शैली की चर्चा...’
दोनो अब खिल खिल नहीं कर रहे हैं। दोनो अब राम राज्य में खिल खिल नहीं कर रहे हैं। दोनों ने आंखों के संकेत से पुनः कही मिलने की बात कही और बिना खिल खिल किए अपनी- अपनी राह चल दिए। हां एक दूसरे से विदा लेते समय जय श्रीराम कहना नहीं भूले।
दो खिलखिलाते हुए नवयुवक, सावधनीवश, बिना खिल खिल किए, जय श्रीराम कहकर एक दूसरे से विदा हुए तो दो समव्यस्क नवयुवतियां खिल खिल करती उस गलियारे में एक दूसरे से मिल गईं। उल्लास भरे वातावरण में खिल खिल ही शोभा देती है। पूरे चौदह वर्ष, यह राजमहल खिलखिलाहट की प्रतीक्षा में तो ही प्रतीक्षित रहा है। यह अलग बात है कि कुछ की खिलखिलाहट स्वाभाविक होती है और कुछ खिलखिलाहट को स्वाभाविक दिखाने का प्रयत्न करते हैं। इस समय इस राजभवन में भी ...
राजभवन। कैसा होता है
राजभवन। आमजन तो इसकी मात्रा कल्पना ही कर सकता है।
;वैसे पाठको यदि मैं कहूं कि मैंने भी राजभवन नहीं देखे हैं तो यह एक अर्द्धसत्य होगा। मेरा राजभवन का कोई अनुभव नहीं है। मैंने राजभवन, या तो ऐतिहासिक स्थलों की यात्रा करते समय, या ऐतिहासिक एवं पौराणिक नाटकों ,धरावाहिकों पिफल्मों में देखे हैं। या पिफर संग्राहलय के रूप में परिविर्तित हो गए राजभवन देखे हैं- मृत राजभवन। यदि आप मुझसे अपेक्षा करें कि मैं राजभवन का चित्राण भोगे हुए यथार्थ की तरह करूंगा तो आपको निराशा होगी। राजभवन मेरी लिए वास्तविकता से दूर एक कल्पना की वस्तु है, जो सर्वसाधरण को कलपाती ही है। जब भी राजभवन की गतिविध्यिों का वर्णन हुआ है तो वर्णन राजा, रानी, राजकुमार, राजकुमारी,मंत्राी आदि में ही सीमित रहा है। सर्वसाधरण से महल तो सदैव दूर ही रहे हैं। सर्वसाधरण इनके वैभव को दूर से देख सकता है, उसके स्वप्न ले सकता है, उनकी समृद्धि के लिए श्रमदान कर सकता है और आवश्यक्ता पड़ने पर उनकी सुरक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर सकता है।
सर्वसाधरण तो सेवक होता है और सेवक वैभव एवं आनंद का साध्न तो प्रस्तुत कर सकता है, उसका भोग नहीं कर सकता। यदि वो कुछ भोग करता है तो उच्छिष्ट का, प्रभु कृपा से जो शेष रह जाता है। राजभवनों की समृद्धि को निहारने और अपने भाग्य पर संतोष करने का ही उसे अध्किार है। अपने प्रभु की सेवा करते समय यदि महल की समृद्धि के कुछ अंश का वह भोग कर ले तो इसे उसे अपना सौभाग्य मानना चाहिए। पर इस भोग विलास में उसे डूबने का नहीं सोचना चाहिए। उसे निंरतर इस बात का ध््यान रखना चाहिए कि अपना कर्म समाप्त कर उसे अपने गृह वापस जाना है और उसका गृह राजभवन का एकांश भी नहीं है।
वैसे भी मुझे भी राजभवन में रहने वाले पात्रों की गतिविध्यिों का वर्णन करना है। मुझे भी ध््यान रखना है कि मैं राजभवन की समृद्धि की चकाचौंध् में विस्मृत, आने लक्ष्य से भटक न जाउफं।द्ध
तो दो समव्यस्क युवक, इध्र अपना महत्वपूर्ण कर्म करने की इच्छा से अपनी-अपनी राह गए और उध्र दो नवयुवतियां खिल खिल करती उस गलियारे में एक दूसरे से मिल गईं। एक तो यौवन का प्रभाव और दूसरे प्रकृति की देन के कारण दोनों सौंदर्य की प्रतिमूर्ति लग रही थीं।; राजभवनों में सुंदर नारियों को सेविका रखने की पंरपरा है, बहुत कम होता है कि मंथरा जैसी मुंहलगी दासियां इस परंपरा में न आएं। राजभवन में जब सुंदर कक्ष, सुंदर आसन, सुंदर यवनिका, सुंदर कालीन, सुंदर पात्रा, सुंदर वस्त्रा आदि हो सकते हैं तो सुंदर सेविकाएं क्यों न हों। राजभवन सुंदर होगा, तभी तो राजभवन कहलाएगा। राजभवन के कुछ ‘सेवकों’ का कक्ष अनेक श्रेष्ठियों से भी सुंदर होते हैं।द्ध
तो दो नवयुवतियां खिल... खिल... करती एक दूसरे से मिलीं।
‘ कैसी हैं सखि, मृगनयनी !’ खिल... खिल...
‘ तूं कैसी है सखि, कामायनी ? ’ खिल... खिल...
‘ मैं अच्छी हूं पर लगता है आप अपना भला नहीं चाहती हैं, सखि!’ खिल... खिल... गायब
‘तूं क्या कह रही है, मैं समझी नहीं, सखि!’ खिल... खिल... गायब
‘ समझ सखि,समय के परिवर्तन को समझ। माता सीता ने सबको क्या समझाया था। राजभवन में संभ्रांत भाषा का ही प्रयोग किया जाए। एक-दूसरे को तूं कहकर संबोध्ति न किया जाए।’
‘क्षमा करें, मैं भूल गई।ध्ीरे-ध्ीरे अभ्यास होगा। पर, सखि को तूं कहने में जो आत्मीयता है... ।’
‘अभ्यास करती रह, अन्यथा एक दिन हो सकता है... आजकल व्यस्तता कितनी बढ़ गई है ? प्रातः से कब संध््या हो जाती है, पता ही नहीं चलता। पर इस कर्म में कितना आंनद आता है जैसा स्वामि से आभूषण मिनले पर आता है। ’ खिल... खिल... का पुर्नारंभ ।
‘ हां... सखि, पहले रसोई -कक्ष में जैसे कोई कार्य ही नहीं होता था। लगभग एक ही तरह का सात्विक भोजन प्रतिदिन बनता था। लगता था जैसे भोजन खा नहीं रहे हैं, कर रहे हैं।’ खिल... खिल... का पुर्नारंभ ।
‘ भोजन बनाने और खाने की जैसे औपचारिकता ही पूर्ण की जाती थी।’ खिल... खिल... ।
‘ पर अब तो सीता माता की देखरेख में छप्पन भोगों का निर्माण होता है। एक से बढ़कर एक स्वादिष्ट भोजन का निर्माण। जिह्वा हर समय लपलपाती रहती है।’ खिल... खिल...।
‘ अतिथि भी तो कितने हैं, अयोध््या में..’
‘सीता माता सबके भोजन का पूरा ध््यान रखती हैं।’
‘हम सेविकाओं का भी तो कितना ध््यान रखती हैं। जो भोजन शेष रह जाता है, उसे हमें अपने- अपने घर ले जाने के लिए बंध्वा देती हैं। हमें भी उस स्वादिष्ट भोजन का आनंद उठाने का अवसर देती हैं।’ खिल... खिल.।
‘तभी तो हम, स्वादिष्ट भोजन के निर्माण में अपनी पूर्ण क्षमता लगा देती हैं।’ खिल... खिल...।
‘ और स्वादिष्ट भोजन प्राप्त होने की प्रतीक्षा में...।’ खिल... खिल... ।
‘ तो चल सेवक कक्ष में प्रतीक्षा करें।’
 खिल... खिल...खिल । खिलखिल भरी है अयोध््या।
;2द्ध
राम आगमन के पश्चात् अयोध््या की एक असामान्य रात। सामान्यतः रात काली होती है परंतु असामान्यतः रात उजली होती है। सामान्यतः अंध्ेरे को दूर करने के लिए अनेक व्यक्तिगत एवं सामूहिक प्रयत्न करने पड़ते हैं और तनिक-सा भी अवसर मिलते ही अंध्ेरा पुनः उपस्थित हो जाता है। असमान्य स्थिति में अंध्ेरा लगभग निष्कासित हो जाता है, वह जैसे खदेड़ दिया जाता है। उल्लसित मन ऐसा वातावरण उत्पन्न करता है कि प्रकाश का एक अजस्त्रा स्त्रोत जैसे बह निकलता है।
असामान्य स्थिति प्रभु कृपा से ही उत्पन्न होती है।    
समस्त अयोध््या उल्लास में डूबी हुई है। सूर्यवंशी राम के राज्य में अमावस्या भी सूर्य के प्रकाश से अध्कि प्रकाशवन् एवं उल्लसित है। लंकाध्पिति रावण को मृत्यु की गोद में सुलाकर जिस दिन राम अयोध््या आए उस दिन अमावस्या थी। अमावस्या की रात अंध्ेरे का पूर्ण आध्पित्य होता है। उस रात उजाले को अंध्कार से संघर्ष करने के लिए अपनी पूरी शक्ति झोंकनी पड़ती है। अंध्कार अट्टहास करता है और टिमटिमाता हुआ उजाला अपनी निडरता एवं साहस के साथ संर्घषशील होता है। यह प्रकृति का नियम है कि अततः उजाला ही जीतता है तथा पूर्ण चंद्र चंादनी बिखेर देता है। पर अयोध््या में तो चांदनी के साथ सूर्य भी अपनी उर्जा के साथ उपस्थित है। सूर्यवंशी राम का राज्य।
टिमटिमाते हुए दीये स्वर्णिम प्रकाश बिखेर रहे हैैं। सारी अयोध््या स्वर्ण में डूबी हुई दृष्टिगत हो रही है। स्वर्णिम अयोध््या। लंका भी तो स्वर्णिम थी। पर आज? स्वर्ण और स्वर्ण में अंतर होता है।
अयोध््या के महल के, अतिथि गृह के एक समृद्ध कक्ष में यही प्रश्न विभीषण के मन में किसी विद्रोही की तरह  बार-बार अपना सर उठा रहा था। लंका भी तो स्वर्णिम थी। पर आज? एक यही प्रश्न नहीं, विभीषण के मन में तो अनेक प्रश्न सर उठा रहे थे और विभीषण की दशा उस राजा के समान थी जो अपने विद्रोहियों से ही नहीें आक्रमणमुद्रा युक्त अपने समर्थकों से भी घिर गया है।
अपने प्रभु राम के राज्याभिषेक में सम्मिलित होने के लिए लंका के वर्तमान राजा, लंकाध्पिति विभीषण, लंका को जस की तस ध्र दीनी चदरिया समान छोड़ आए थे। अयोध््या के उल्लास भरे वातावरण ने उन्हें यह सेाचने का अवसर ही कहां दिया कि जिस चदरिया को वो छोड़ आए हैं उसकी दशा कैसी है? प्रभु की इच्छा समक्ष हो तो भक्त कहां कुछ सोच पाता है? प्रभु इच्छा तो सर्वोपरी होती है। प्रभु की इच्छा को ही भक्त की इच्छा होना होता है। और सच्चा भक्त तो वो होता है जो प्रभु इच्छा प्रकट न करें तब भी जान लेता है कि प्रभु की इच्छा क्या है। जो भक्त प्रभु की इच्छा को नही समझ पाता वो अज्ञानी होता है और ऐसे भक्त के अज्ञान का निराकरण प्रभु के अति निकटवर्ती अनन्य भक्त करते हैं।
राजा विभिषण चाहे आज लंकाध्पिति हैं पर हैं तो मूलतः प्रभु राम के भक्त ही। प्रभु के भक्त होने के कारण ही तो उन्हें यह पद प्राप्त हुआ है। क्या आज से कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने कल्पना भी की थी कि वे लंकाध्पिति होंगे। वे चाहे रावण के भ्राता थे परंतु अपनी गतिविध्यिों के कारण उसके विश्वासापात्रा नहीं थे। वे तो एक निरीह , सज्जन, हानिरहित, आत्मकेंद्रित जन थे जिससे रावण को कोई भय नहीं था। रावण के समक्ष उनका अस्तित्व एक चींटी के समान था जिसे वह कभी भी मसल सकता था। ऐसा व्यक्तित्व लंका का राजा बन जाएगा, किसने सोचा होगा? ऐसा तो प्रभु ही सोच और कर सकते हैं। तभी प्रभु की कृपा पाने को उनके इर्द-गिर्द भक्त जन किसी भ्रमर समान मंडराते रहते हैं।
प्रभु किसपर कृपा करेंगे, इसका प्रभु को ही पता होता है। अनेक बार उनके निकटवर्ती भक्तों को भी वो कृपा प्राप्त नहीं होती है जो सुदूर भक्तों को हो जाती है। प्रभु के निकटवर्ती अनेक भक्त होगें जिन्हें राजकाज का असीम अनुभव होगा परंतु प्रभु ने विभीषण जैसे भक्त को ही चुना। प्रभु जानते हैं कि किस भक्त का स्थान कहां है। प्रभु हर रिक्त स्थान की पूर्ति उपयुक्त पात्रा से करते हैं। इस प्रकार प्रभु की कृपा जिस भक्त को प्राप्त हो जाती है, वो प्रभु के वचनों को ही सत्य मान अंध्भक्तिभाव से कोल्हू के बैल सम परिक्रमा करता रहता है। उसे प्रभु की इतनी कृपा प्राप्त हो जाती है कि उसके मुख से प्रभु ही बोलते हैं। भक्त स्वयं कहां कुछ कह पाता है। वह तो एक ही वाक्य कहता है- प्रभु इच्छा।
विभीषण प्रभु की शक्ति को जानते हैं, उनकी कृपा से परिचित हैं तथा उनके प्रति पूर्ण विश्वास भी रखते हैं, परंतु पिफर भी न जाने क्यों उनके मन में इस समय अनेक प्रश्न उठ रहे हैं। भक्त के मन में प्रश्न उठना उचित नहीं है। जिस भक्त के मन में प्रश्न उठते हैं , उसे समझ लेना चाहिए कि वह प्रभु की शक्ति पर विश्वास नहीं कर रहा है और यह भ्रम पाल रहा है कि वह स्वयं सब कुछ करेगा। कहीं प्रभु को इस बात की भनक भी हो गई कि उनका भक्त कर्म को स्वयं करने का भ्रम पाल रहा है तो प्रभु की दृष्टि वक्र भी हो सकती है। प्रभु की वक्र दृष्टि राजा को रंक बना सकती है। भक्त को तो नियति के आधर पर कर्म करने का अध्किार है और नियति तो वही है न जिसे प्रभु ने नियत किया हुआ है।
जो प्रभु की इच्छानुसार नहीं चलता वो बालि या रावण की गति को प्राप्त होता है और जो प्रभु की इच्छानुसार चलता है वह सुग्रीव या विभिषण सम प्रभु कृपा पाता है। यह संसार का नियम है अतः कलयुग तक में लागू होता है। प्रभु के पर्यायवाची शब्द हैं--इंद्र,ईश्वर, ब्रह्मा, राजा, विष्णु, स्वामी, सत्ताधरी, महाविद्वान,पारा, प्रधन आदि।
तो इस समय विभीषण प्रकट में तो प्रभु इच्छा पर चलते दृष्टिगत हो रहे थे परंतु उनका अर्तमन ;संभवतः प्रभु की इच्छा से हीद्ध अनेक प्रश्नों से घिरा हुआ था। वे बार-बार उन प्रश्नों को झटकते पर जैसे कोई मच्छर बार- बार हाथ से हटाने के बाद भी कान में घूं-घूं करता है, कोई याचक दुतकारने के बाद भी याचना भरे स्वरों का मुक्त हृदय से दान करता है अथवा कोई दुष्ट बार-बार दंड देने पर भी अपराध् करता है वैसे ही लंका से जुड़े प्रश्न उन्हें चिंतित कर रहे थे।
विभीषण को यह निश्चित नहीं था कि उनके मन में प्रश्न उत्पन्न कर उन्हें भटकाने के पीछे प्रभु की इच्छा है कि नहीं, इसलिए वे प्रकट में अपने मुख पर निश्चिंत भक्त के भाव ही लाए हुए थे। यदि प्रभु समक्ष होते तो वे तत्काल विभीषण के अर्तमन को जान जाते। शुक्र है प्रभु अयोध््या में राम- राज्य स्थापित करने में व्यस्त हैं। लक्ष्मण ही विभीषण को प्रभु इच्छा से अवगत कराते रहते हैं।
प्रभु राम व्यस्त हैं परंतु पिफर न जाने विभीषण को ये क्यों लगता है कि प्रभु हर स्थान पर उपस्थित हैं। कल जब उनकी सेवा में निर्धरित अयोध््या के एक सेवक ने उनसे प्रश्न किया - क्या बात है लंकाध्पिति, कुछ चिंतित दृष्टिगत हो रहे हैं ?’ तो विभीषण को लगा कि जैसे श्रीराम उनसे प्रश्न कर रहे हैं। विभीषण के सेवकों ने, जो स्वयं लंका से हैं और विभीषण के समान ही लंका के प्रति चिंतित हैं, विभीषण से कभी ऐसा ‘आत्मीय’ प्रश्न नहंी किया ।
कोई शंका नहीं रहे इसलिए विभीषण ने तत्काल मुख पर अध्कि मुस्कान लाते हुए उत्तर दिया- चिंता ? अयोध््या में चिंता कैसी? ’
- जब आप आयोध््या आए थे तो आपका मुखमंडल प्रसन्नता के अतिरेक से छलक रहा था, परंतु अब...’’
विभीषण ने स्वर को कारुणिक बनाते हुए कहा- प्रभु से बिछड़ने का समय जो आ गया है। सब दिन होई न एक समाना। प्रभु से बिछुड़ने के दुख को आप अयोध््यवासियों से अध्कि और कौन जान सकता है। प्रभु से बिछुडने के विचार मात्रा से ही मन दुखी हो जाता है। पर प्रभु इच्छा।’
विभीषण ने अपनी वक्तृत्व से सेवक को तो विश्वास दिला दिया कि वे ंिचतित नहीं हैं और उन्हें पूर्ण विश्वास है कि वही होगा जो प्रभु चाहेगें। प्रभु अपने भक्तों का शुभ ही चाहेंगें। परंतु यदि लक्ष्मण ने यह प्रश्न कर दिया तो? विदा लेते समय प्रभु ने ही यह प्रश्न कर दिया तो ? विभीषण को भावों पर अंकुश लगाना होगा और प्रयत्न करना होगा कि प्रश्नाकुल भाव उनके मुखमंडल की शोभा न बढ़ाएं।
भक्त बने रहना कितना सरल है और राजा बनना कितना कठिन है। राजा बनते ही सरलता और सहजता का गला घोटना पड़ता है। एक अच्छा अभिनेता बनना होता है। भक्त को सब कुछ भूल मात्रा अपने प्रभु का ध््यान ध्रना होता है जबकि राजा को, कभी-कभी प्रभु को भी भूल, सर्वजन का ध््यान ध्रना होता है। राजा बनते ही व्यक्ति के अहं का विस्तार आरंभ हो जाता है जबकि भक्त बनते ही उसके अहं का विगलन आरंभ हो जाता है। एक राजा के मन में वैराग्य जाग जाए तो वह राजा जनक की भांति विदेह हो सकता है परंतु यदि एक भक्त के मन में यदि राजत्व जाग जाए तो उसकी स्थिति संाप और छछूंदर की हो जाती है। वह विभीषण हो जाता है।
सुग्रीव के समक्ष यह समस्या कम आई क्योंकि राम के प्रति उनकी आस्था तो थी पर वे राम भक्त होने के कारण बालि द्वारा पीड़ित नहीं किए गए थे। राम ने उनकी सहायता  की और सुग्रीव ने राम की सहायता की। सुग्रीव रामभक्ति के कारण निष्कासित नही किए गए थे। विभीषण तो राम भक्ति के कारण लतियाए गए थे। सुग्रीव ने जब शासन संभाला तो उन्हें पर्याप्त समय तक राम का साथ मिला। बालि के हितचिंतक विरोध् में स्वर नहीं उठा सके। अंगद के साथ ने भी सुग्रीव की राह भी सरल की। परंतु विभीषण ? अनेक अनिश्चितताओं में घिरे हुए हैं। नहीं जानते कि लंका पहुंचकर कैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा। माना कि आते हुए लक्ष्मण ऐसी व्यवस्था कर आए हैं कि वहां की हर घटना की सूचना लक्ष्मण तक पहुंच रही है। लक्ष्मण उन्हें निरंतर आश्वस्त भी कर रहे हैं। परंतु एक सूचना के कारण लक्ष्मण भी तो चिंतित हैं। एक अध्कि गोपनीय सूचना।एक रहस्य जिससे बहुत कम लोग परिचित हैं। एक रहस्य जो बहुत ही विस्पफोटक है। वे सोचकर ही सिहर जाते हैं। इसी कारण वे लंका जाने का नाम सुनते ही अंदर से कांप उठते हैं। लंका उन्हें एक भयानक विषैले सर्प की तरह प्रतीत हो रही है।
इसी समय द्वारपाल ने प्रवेश कर सूचना दी- सुमंत जी आपसे मिलने के लिए आ रहे हैं।
आशंकित मन को हर घटना आशंकित करती है। सुमंत जी क्यों आ रहे हैं? उनके आने का क्या प्रयोजन है?
तभी विभीषण ने देखा कि एक छिपकली घातमुद्रा में तेजी से कहीं से आई और उसने दीपक के समीप की दीवार पर बैठे कीट को अपने मुंह में दबोच लिया। कीट उसके मुख में अपने प्राणों के लिए छटपटा रहा था। विभीषण सिहर गए। राजा विभीषण सिहर गए। राम-रावण के युद्ध के साक्षी विभीषण सिहर गए। लंकाध्पिति विभीषण सिहर गए। क्या यह भी प्रभु इच्छा का परिणाम था? मात्रा भक्त होते तो विभीषण इसे प्रभु इच्छा मानकर मुंह ढककर निश्चिंत हो सो जाते। या अध्कि से अध्कि कीट की दशा पर करुणा प्रकट करते हुए दो आंसू बहा देते। पर क्या राजा विभीषण ऐसा कर सकते हैं? क्या, यदि कीट की पत्नी उनके समक्ष छिपकली के अत्याचार के विरुद्ध न्याय की मांग करे, तो एक राजा के रूप में वे निश्चिंत होकर सो सकते हैं।

पुनः पुनः फिर जी..


पुनः पुनः फिर जी...

          जैसे -किसी नेता को हारा चुनाव जीतने पर, किसी भ्रष्टाचारी को बेदाग भ्रष्टाचार करने पर, वकील को झूठा मुकदमा जीतने पर, पुलिसवाले को दोनों पार्टियों के  ‘सार्थक’  सहयोग से कत्ल का केस निपटाने पर, विद्यार्थी को बिना पकड़े नकल द्वारा परचा पूरा करने पर,धर्मगुरु को काम और अर्थ का फल प्राप्त करने पर -आलौकिक सुख प्राप्त होता है, वैसा आलौकिक तो नहीं पर उसके सहोदर-सा सुख किसी मध््यवर्गीय ईमानदार जीव को मुफत की तसल्ली बख्श दावत खाने पर मिलता है। रात को सातवें आसमान के सुख में डूबे मन का सुख की ऐसी खुमारी चढ़ती है कि वो सुबह अक्सर दफतर के लिए लेट हो जाता है।
        हमारे राधेलाल भी इसी खुमारी में डूबे हुए थे कि उनकी पत्नी ने, जो कम खुमारी में डूबी थी, दफतर के लिए उठा दिया- सात बजने वाले हैं, दफतर नहीं जाना है क्या?
- अरे यार, बहुत दिनों बाद बढ़िया नींद आ रही थी... कल की पार्टी बहुत जोरदार थी।
- जोरदार क्यों नहीं होगी, बढ़िया शराब की नदियां जो बह रही थीं। मैं देख रही थी कि खूब गोते लग रहे थे तुम्हारे...
             अपने पीने पर आक्रमण होता देख अच्छे-अच्छे पतियों की खुमारी टूट जाती है , राधेलाल की भी खुमारी टूट गई और उसने प्रत्याक्रमण की मुद्रा में कहा- और तुम जो चाट वाले स्टाल पर भुक्खड़ की तरह लगी हुई थी... गोलगप्पे, दही भल्ले, चीला और वो क्या टिकिया... कुछ छोड़ा तुमने...और उसके बाद खाने पर ऐसे टूटे कि...
-हम खा रहे थे, पी नहीं रहे थे...
- नशा चाहे जुबान का हो या गले का, नशा नशा होता है।
    पत्नी ने सुबह की चाय का कप पति को थमाते हुए कहा- उपदेशक जी चाय पीयो,... यारब वो न समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात...
        पति ने मुस्कराकर चाय का कप पकड़ते हुए कहा- और तुम्हारे चचा गालिब ने ही कहा है, तौबा तौबा शराब से तौबा... और मैडम जी, सुबह की चाय का भी एक नशा होता है... चाय मिलते ही वैसी ही ताजगी आ जाती है जैसी हाथ में गिलास आते... बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद...कुछ भी कहो कल मल्होत्रा ने दावत बहुत जोरदार दी...क्या नहीं था खाने को और एम्बियेंस...
- पंजाबियों की पार्टी होती जोरदार हैं।
- दिखावा भी जोरदार होता है। उसने दस डिश रखी है तो मैं बीस रखूंगा वाली प्रतियोगिता होती है। एक समय था जब भगवान को छप्पन भोग लगाए जाते थे और भक्त हाथ बांधे प्रभु का भोग लगाते देख प्रसन्न होता था। आजकल प्रभु भक्तों के लिए विवाहोत्सव आदि में छप्पन भोग परोसते हैं और भक्त भोग लगाते हैं और हाथ जोड़कर भोग की तारीफ करते हैं।
- अरे बाप रे...पौने आठ हो गए... आपके चक्कर में मैं लेट हो जाउंगी... आज कामवाली भी अभी नहीं आई है...
- लगता है वो भी  रात को किसी मल्होत्रा की पार्टी में गई होगी... ज़रा अखबार पकड़ा देना।’ कहकर राधेलाल हंसे पर अखबार पकड़ते ही हंसी नैतिक मूल्यों -सी गायब हो गई और वे ऐसे उछल पड़े जैसे  हिंदी पिफल्मों की किसी हिरोईन को पूरे कपड़े पहने देख लिया हो, इस प्रौढ़ावस्था में किसी सुंदरी का प्रेमपत्र सामने आ गया हो या पिफर अपने विरोध्ी का प्रोमोशन-पत्र देख लिया हो। रसोई की ओर प्रगतिशील पत्नी के कदमांे के लिए अवरोध् उत्पन्न करते हुए चिल्लाए-से,‘‘ सुनो, ये लो फिर रसोई गैस, मिट्टी के तेल और पेट्रोल के दाम बढ़ गए और इस बार तो बढ़े भी जेबफाड़ हैं...
             पत्नी के प्रगतिशील कदम जनविरोधी नीतियों की घोषणा सुन लौटे तो नहीं, रुक अवश्य गए। सब्जियों और दालों ने लो पिफर के अंदाज में पहले ही रसोई महंगी की हुई है, और उसपर पतिदेव की यह सूचना- सुनो, ये लो फिर रसोई गैस, मिट्टी के तेल और पेर्टोल के दाम बढ़ गए और इस बार तो बढ़े भी जेबफाड़ हैं...’ । दाम बढ़ाने वालों पर गुस्सा करके वह क्र भी क्या सकती है, बस वोट नहीं देगी और जिसे देगी उसकी क्या गारंटी है कि लो पिफर नहीं होगा।इसलिए उसे गुस्सा आता है पति पर जो गैस का खाली सिलेंडर समय से नहीं भरवाता है, गाड़ी में पेट्रोल की टंकी रिजर्व से भी नीचे ले आता है। इससे ज्यादा नहीं, उंफट के मुंह में जीरा तो आ ही सकता है, बचत की एक मानसिक संतुष्टी तो मिल सकती है।
            ये लो फिर आजकल के भारतीय जीवन में सामान्य घटना-सा हो गया है। कई बार ये लो फिर जागो मोहन प्यारे से आरंभ होता है और रात को आ जा री निंदिया के साथ समाप्त होता है। इस लो फिर में लेना कुछ नहीं होता है और न ही कुछ मिलता है और यदि कुछ मिलता भी हो तो उसके प्रति आपकी अनिच्छा ही होती है।
              अभी तो पति ने अखबार पढ़कर इतना ही ‘ये लो फिर ‘’  बताया है कि रसोई गैस, मिट्टी के तेल और पेर्टोल के दाम बढ़ गए, अभी यह ‘ये लो फिर ’ तो नहीं बताया कि दूध के दाम बढ़ गए हैं, बसों के किराए बढ़ गए हैं, बिजली के दाम बढ़ गए हैं, बच्चे की फीस बढ़ गई,हाउसिंग और कार लोन बढ़ गया है किसी तीन साल की बच्ची का यौन शोषण हुआ है, किसी बलात्कारी ने सत्तर साल की बुढ़िया को नहीं छोड़ा,  किसी कसाब पर मुकदमा चल रहा है आदि आदि ‘ये लो फिर ’ ।
            कहते हैं कि इतिहास अपने को दोहराता और संभवतः ये इसी कहने का परिणाम है कि हमारे जीवन में ‘ये लो फिर ’  बहुत होता है। हर मनुष्य का अपना इतिहास होता है- कुछ का लिखा जाता है, कुछ लिखवाते हैं और बहुतों का अलिखित रहता है। अब इतिहास है तो जीवन में ‘ये लो फिर ’ आएगा ही। आप ध््यान से देखेें तो जैसे आपके चारों ओर भ्रष्टाचार विद्यमान है वैसे ही जीवन को कोई कोना ऐसा नहीं है जहां ‘ये लो फिर ’ विद्यमान न हो।
            हमारी सर्वप्रिय राजनीति मेें लो पिफर महिमा वर्णन - ये लो फिर उसे टिकट मिल गया, लो पिफर दाम बढ़ गए , ये लो फिर विरोधी दल ने भारत बंद किया, ये लो फिर संसद पूरे सत्र नहीं चली, ये लो फिर मंत्राीमंडल में बदलाव हुआ, ये लो फिर नेता असंतुष्ट हुए, लो फिर नेता जी ने आत्मा की आवाज सुनी, लो फिर मंत्री जी पर सी बी आई इंक्वारी बैठी, लो फिर मंत्री जी निर्दोष पाए गए, लो फिर लाठी चार्ज हुआ, लो फिर सरकार ने चुनावी बजट पेश किया, लो फिर चुनाव आ गए, लो फिर मध््यावध् िचुनाव आ गए, लो फिर घोटाला हो गया, लो फिर घोटाले में कोई नहीं फंसा।
         साहित्य में देखें,‘ ये लो फिर महिमा - लो फिर उस साले को पुरस्कार मिल गया, लो फिर उसका एक और संकलन आ गया, लो फिर उसकी किताब कोर्स में लग गई, लो फिर साला अध््यक्ष बन गया, लो फिर उसकी पुस्तक चर्चित हो गई, लो फिर युवा लेखिका/लेखक उससे रात में मार्गदर्शन लेने चला गया, लो फिर प्रकाशक ने रॉयल्टी नहीं दी, लो फिर उसकी किताब बल्क परचेज में आ गई, लो फिर  वो संपादक बन गया, लो पिफर मेरी रचना वापस आ गई और उसकी छप गई।
           अथ न्यायालय  ‘ये लो फिर ’  महिमा - लांे फिर मुकदमा बीस बरस से चल रहा है , लो फिर एक और बदमाश बरी हुआ,लो फिर पैसे की चल गई, लो फिर मंत्री जी को जेल में वी आई पी सुविधा मिली, लो फिर कैदियों ने सुपरीटंेडेंट को मार दिया, लो फिर जेल में मोबाईल मिले,लो फिर काले कोट वालों ने हड़ताल की।
           सरकारी दपफतर में ‘ये लो फिर ’ महिमा - लो फिर बड़े बाबू नहीं आए,  लो फिर उसे आउट आपॅफ टर्न प्रोमोशन मिल गया, लो फिर उसपर सी बी आई इंक्वायरी बैठ गई, लो फिर साहब ने सेक्रेटरी को देर तक काम करने के लिए अकेले रोक लिया, लो फिर साले ने सी आर खराब कर दी।
          परिवार में ये लो फिर महिमा - लो फिर दहेज मांग रहे हैं, लो फिर लड़की पैदा हो गई, लो फिर बहू खाली हाथ आई, लो फिर कोई जला, लो फिर बहू ने मुकदमा कर दिया, लो फिर उनकी लड़की भाग गई, लो फिर मोहल्ले की नाक कट गई, लो फिर अपनी नाक कट गई।
         अभी तो मैंने ये लो फिर का वर्णन -समुद्र में बूंद जितना, थाने में ईमानदारी जितना, नेता में सभ्य आचारण जितना, अमेरिकी प्रशासन में विनम्रता जितना, पाकिस्तान सरकार के सत्य वचन जितना, आतंकवादी की आंख में आंसू जितना, हिंदी फिल्मो की हिरोईन के शरीर में कपड़े जितना ही किया है। इसका और वर्णन करने के लिए मुझे समुद्र को स्याही, धरती को कागज यानि उतना ही करना पड़ेगा जितना भारत में भ्रष्टाचार के वर्णन के लिए करना पड़ता है।
        देश का और आपका इस  ये लो फिर ‘’ के चक्कर में क्या होता है, आपके जीवन में लो फिर कितना लो अथवा हाई है, या आज क्या-क्या लो फिर हुआ, जानता नहीं पर इतना जानता हूं कि इस लो फिर के कारण राधेलाल के घर में सुनामी आ गई। क्या-क्या लो फिर हुआ? पढ़िए- लो फिर बाई नहीं आई, लो फिर कार की बैटरी डाउन हो गई, लो फिर मां बाउ जी दो महीने के लिए आ रहे हें, लो फिर दिल्ली बंद हो गया, लो फिर छोटी को बुखार आ गया, लो फिर सोसायटी ने मेनटेनेंस बड़ा दिया, लो फिर गीजर खराब हो गया, लो फिर पानी नहीं आ रहा है, लो फिर बिजली चली गई आदि आदि अनादि।
0000000000