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शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009

प्रेम जनमेजय का व्यंग्य-अंधेरे के पक्ष में उजाला

प्रिय/सम्माननीय
झिलमिलाते दीयों की जीवंत मंगल वेला में
आप सबको
दीपावली की मंगलकामनाएं

एवं हार्दिक बधाई

प्रेम जनमेजय एवं परिवार


अंधेरे के पक्ष में उजाला
प्रेम जनमेज
मेरे मोहल्ले में अनेक चलते किस्म के लोग रहते हैं। मेरे मोहल्ले में पुलिस, न्यायालय, संसद, साहित्य, नौकरशाही आदि क्षेत्रों से जुड़े लोग रहते हैं। आप तो ज्ञानी ही हैं और जानते ही होंगें मनुष्य भी एक मशीन है और इस मशीन के पुर्जों का सही इस्तेमाल करना चलते किस्म के लोगों का ही कमाल होता है और ऐसे महापुरुषों को चलाता पुर्जा भी कहा जाता है। मेरे मोहल्ले में इन्हीं ‘चलताउ’ किस्म के लोगों का साथ निभाने और नैतिक बल देने के लिए एक चलती सड़क भी है। जैसे नारे हमें निरंतर ये भ्रम देते रहते हैं कि देश चल रहा है वैसे ही इस सड़क से लगातार फेरीवालों की आवाजाही और उनकी भांति-भांति की आवाज़ें निरंतर भ्रम देती रहती हैं कि ये सड़क बहुत चलती है। कोई रद्दी पेपर की पुकार लगाकर आपके कबाड़ से आपको लाभान्वित करने का अह्वान देता है, कोई बासी सब्जी को ताजा का भ्रम पैदा करने वाली रसघोल पुकार को जन्म देता है। कोई चाट-पकोड़ी की चटकोरी जुबान से चटपटाता है तो कोई...। मौसम के अनुसार आवाज़ें भी बदलती रहती हैं। चुनाव के मौसम में अपनी रेहड़ी पर देशसेवा लादे, देशसेवा ले लो, देशसेवा ले लो की गुहार लगाने वाले भी आते हैं। ये सभी आवाज़ें मेरी परिचित आवाज़ें हैं और मुझे परेशान नहीं करती हैं। जैसे रेल की पटरियों के पास रहने वालों को रेलगाड़ी का आना-जाना, मछली बाज़ार में रहने वालों को मछली की गंध, सरकारी दफतरों में काम करने वालों को भ्रष्टाचार, पुलिस वालों को कत्ल, वकील को झूठ आदि परेशान नहीं करते। पर उस दिन एक नई पुकार सुनकर मैं परेशान हो गया, कोई पुकार रहा था --उजाला ले लो, उजाला ले लो, बहुत सस्ता और उजला उजाला ले लो। पचास परसेंट डिस्काउंट पर उजाला ले लो।’ डिस्काउंट सेल तो बड़े-बड़े माॅल पर लगती है या उनकी देखा-देखी किसी छोटी दुकान पर। किसी फेरीवाले को मैंनें डिस्काउंट सेल लगाते हुए नहीं देखा। हां मोल-भाव करते जरूर देखा है। मोल-भाव तो हम भारतीयों की पहचान और आवश्यक्ता है। बिना मोलभाव किए माल खरीद लो तो लगता है कि लुट गए और मोलभाव करके खरीद तो लगता है कि लूट लिया। मैंनें फेरी को बुलाया और कहा- तुम्हें मैंनें पहले कभी इस मोहल्ले में नहीं देखा, तुम कौन हो और कहां से आए हो? उसने कहा- मैं उजाला हूं और स्वर्ग से आया हूं। - तुम तो सोने के भाव बिका करते थे, तुम्हारी तो पूछ ही पूछ थी, ये क्या हाल बना लिया है तुमने? तुम स्वर्ग में थे तो फिर धरती पर क्या लेने आ गए? - मैं आया नहीं, प्रभु के द्वारा धकियाया गया हूं। - क्या स्वर्ग में भी प्रजातंत्र के कारण चुनाव होने लगे हैं जो उजाले को धकियाया जा रहा है। तुम तो प्रभु के बहुत ही करीबी हुआ करते थे। साधक तो अंधेरे से लड़ने के लिए प्रभु की तपस्या करते हैं और प्रभु अंधेरे से लड़ने के लिए तुम्हारा वरदान देते हैं। तुम तो इतने ताकतवर हो कि एक दीए को तूफान से लड़वा दो, जितवा दो ं पर इस समय तो तुम ऐसे लग रहे हो जैसे प्रेमचंद की कहानियों का किसी सूदखोर बनिए के सामने खड़ा निरीह किसान या फिर आज के भारत का आत्महत्या करने वाला सरकारी आंकड़ों में चित्रित ‘खुशहाल’ किसान। - मेरी हालत तो किसान से भी बदतर है, किसान तो आत्महत्या कर सकता है, मैं तो वो भी नहीं कर सकता।’ यह कहकर वह रोने लगा। मैंनें कहा- उजाला इस तरह रोता हुआ अच्छा नहीं लगता। तुम ही कमजोर हो जाओगे तो ईमानदार मनुष्य का क्या होगा। बताओ तो सही,क्या और कैसे हुआ, तुम राजा से रंक कैसे हुए? - तुम तो जानते ही सतयुग में मेरी क्या ताकत थी। हर समय प्रभु के निकट ही रहता था। कितना विश्वास था प्रभु को मुझपर! अच्छे -अच्छे राजा मुझसे भय खाते थे। चारों ओर मेरा ही साम्राज्य था। अंधेरा मुझे देखते ही दुम दबाकर भाग जाता था। उन दिनों अंध्ेारा दीए तले रहने से भी घबराता था। मेरी ताकत के कारण मुझे बस संकेत भर करना होता था और अंधेरा किसी कोने में अपना मुंह छिपा लेता था। मेरा काम बस प्रभु के चरणों में पड़ा रहना होता था। प्रभु मुझे देखकर प्रसन्नचितदानंद होते और अपनी सृष्टि में मेरा विस्तार देखकर संतुष्ट होते। प्रभु मुझे देखकर प्रसन्न होते और मैं प्रभु को देखकर प्रसन्न होता। जैसे प्रेम में फंसा हुआ नया जोड़ा एक दूसरे को एकटक निहारता रहता है, उसे समय और स्थान का ज्ञान नहीं रहता है, वो दुनिया से कट जाता है, वैसे ही प्रभु और मैं हो गए। हम दोनों अपने प्रति परवाहकामी और संसार के प्रति बेपरवाह हो गए। अंधेरा तो इसी की तलाश में था। उसने धीरे-धीरे अपने पैर पसारने आरंभ कर दिए। एक ही स्थान पर बैठे-बैठे मुझपर चर्बी भी बहुत चढ़ गई थी। हर समय नींद-सी आई रहती थी। इधर अचानक मेरा काम बढ़ गया। समझो सरकारी नौकरी से मैं किसी मल्टीनेशनल कंपनी के चंगुल में पफंस गया। आप जानों प्रभु तो प्रभु होते हैं। निरंतर व्यस्त रहना ही प्रभु का प्रभुत्व होता है और उनके इस प्रभुत्व को उनके भक्त भोगते हैं। व्यस्त प्रभु निर्देश देते हैं और भक्त सेवक बन उनका पालन करते हैं। ज़रा-सी चूक सेवक को उसके पद से स्खलित कर देती है। मेरे साथ भी ऐसा हुआ। काम की अधिकता के कारण एक दिन मुझे उंघ आ गई और किसी ने प्रभु की प्रभुता को चुनौती दे डाली। प्रभु का नजला मुझ पर गिरा और उन्होंने मुझे श्राप दे डाला। उस श्राप के कारण मेरे अनेक टुकड़े हुए और मैं धरती पर आ गिरा। मेरे अनेक टुकड़ों मे से कोई पुलिस की गोद में गिरा, कोई वकील की गोद में गिरा, कोई नेता की गोद में गिरा, और कोई... अब मैं अपने विघटन का क्या बयान करूं...’’ ये कहकर वो फूट-फूट कर रोने लगा। उजाले को रोता देख मेरे घर के हर कोने का अंधेरा अट्टहास करने लगा। मैंनें कहा- देखो उजाले, तुम्हें रोना है तो कहीं और जाकर रोओ, वरना मेरे घर में अंध्ेारा अपना साम्राज्य स्थापित कर लेगा। मेरे घर में तुम्हारे होने का ताकतवर भ्रम बना हुआ है, उसे बना रहने दो। मुझे तुमसे सहानुभूति है, पर क्योकि अब तुम दुर्बल हो चुके हो, इसलिए तुम्हें मैं अपने घर में टिका नहीं सकता हूं। तुम्हारे रहने से मेरे घर में थोड़ा बहुत जो उजाले के होने का भ्रम है वो दूर हो जाएगा और मोहल्ले में मेरी इज्जत का भ्रम टूट जाएगा।’ उजाले ने सुबकते हुए कहा- मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है, मैं सभी जगह से इसी तरह से ठुकराया गया हूं। मेरे किसी टुकड़े को किसी ने शरण नहीं दी है। पुलिसवाले, वकील, नेता आदि सबने यही चाहा कि मैं अपने होने का भ्रम तो पैदा करूं पर खड़ा अंधेरे के पक्ष में रहूं। मेरी भूमिका अंधेरे के गवाह के रूप में रह गई है। मैं क्या करूं? - करना क्या है, वही करो जो समय की मांग है। समय की मांग बहुत बड़ी मांग होती है। इस मांग के कारण ही बाप अपनी बेटी से बलात्कार करता है, इस मांग के चलते ही बेटा कंपनी के काम को मां-बाप की आवश्यकता से अधिक प्राथमिकता देता है, इस मांग के कारण ही जनसेवक अपनी सेवा को प्राथमिकता देता है। आज समय की मांग है कि उजाला अंध्ेारे के पक्ष में खड़ा हो। तो प्यारे तुम चाहे खड़े होओ या बैठो पर मेरे यहां से फूट लो वरना तुम्हें इस घर की युवा पीढ़ी ने तुम्हें मेरे साथ देख लिया तो वो मुझे श्राप दे देगी और मैं तुम्हारी तरह फेरी लगाता अपने आपको बेच रहा हूंगा।’ उजाले ने मेरी ओर जिस निगाह से देखा उसका बयान करते हुए मेरी गर्दन शर्म के कारण झुकी जा रही थी, पर जब अस्तित्व का प्रश्न आता है तो शर्म, लज्जा, नैतिकता,आत्मस्वाभिमान आदि को तेल लेने भेजना ही पड़ता है। उजाले ने ना जाने किस दृष्टि से मुझे देखा कि वो मेरी आत्मा को बेंध गई। उजाला अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए फिर पफेरीवाल बन आवाज़े लगाने लगा।

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13 टिप्‍पणियां:

AlbelaKhatri.com ने कहा…

बहुत ही उम्दा........

कमाल की कारीगरी है प्रेमजी.......

हाथों में जादू है क्या ?

अभिनन्दन !


आपको और आपके परिवारजन को
दीपोत्सव की हार्दिक बधाइयां
एवं मंगल कामनायें.......

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

बहुत उम्दा व्यंग्य!

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन सटीक व्यंग्य!!

सुख औ’ समृद्धि आपके अंगना झिलमिलाएँ,
दीपक अमन के चारों दिशाओं में जगमगाएँ
खुशियाँ आपके द्वार पर आकर खुशी मनाएँ..
दीपावली पर्व की आपको ढेरों मंगलकामनाएँ!

-समीर लाल ’समीर’

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपका व्यंग्य बहुत बढ़िया है।

आज खुशियों से धरा को जगमगाएँ!
दीप-उत्सव पर बहुत शुभ-कामनाएँ!!

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

सटीक व्यंग्य
दिवाली की हार्दिक ढेरो शुभकामनाओ के साथ, आपका भविष्य उज्जवल और प्रकाशमान हो .

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

उजाले का सारा जाला
अंधेरे-पक्ष में कर डाला
दीवाली होती है दिवाला
इसे साबित कर डाला।


देखी उजाले की कारीगरी तो भ्रम सारा टूट गया
सुबह उठकर देखा मैंने अंधेरा उजाले से रूठ गया।

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

बेहतरीन व्यंग..बहुत अच्छा लगा..
दीवाली की आपको हार्दिक शुभकामनाएँ!!!

राजीव तनेजा ने कहा…

अन्धेरा कायम है....

बहुत ही उम्दा और स्तरीय व्यंग्य

शरद कोकास ने कहा…

जनमेजय जी हमेशा की तरह आपका यह व्यंग्य पसन्द आया । -शरद कोकास

डा. अमर कुमार ने कहा…



आपकी रचनाओं का मैं फ़ैन तो हूँ ही, अपने सँकल्न में मैंने
आपकी एक पोस्ट को भी लिया है । यह भी बहुत ही सँयत और बहुत सटीक रचना है । दीपावली की शुभकामनायें !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

यह दिया है ज्ञान का, जलता रहेगा।
युग सदा विज्ञान का, चलता रहेगा।।
रोशनी से इस धरा को जगमगाएँ!
दीप-उत्सव पर बहुत शुभ-कामनाएँ!!

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

च्चच.... आख़िर आपने भी बेचारे को भगा दिया. ऐसा करिए उसे किसी 7 सितारा रिसॉर्ट में भेज दीजिए. आजकल रिसॉर्ट में एक ज़ू होता है. उसमें वे दुर्लभ जंतुओं को रखते हैं. उजाला भी थोड़े दिनों दुर्लभ होने ही वाला है. वे शायद उसे रख लें. पर ज़रा सतर्कतापूर्वक यह काम करिएगा. कहीं बिजली विभाग वाले उसे न लें. उन्होंने उसके ऊपर कुछ करोड़ का ईनाम रखा है - ज़िन्दा या मुर्दा जहां भी जैसे भी मिले...

गिरीश पंकज ने कहा…

achankak aaj aapka blog dekha. maza aa gaya. aapki anek rachnaye parhi hai, lekin blog me parhne kaa maza hi kuchh aur hai. badhai...fir ek samman pane ke liye. samman to jaise aapke peechhe hi pad gaye hai. kahte hai..ham bhi pade hai rahon me.aisa saubhagy kam logo ko hi milta hai.