शनिवार, 27 मार्च 2010
वसंत, तुम कहां हो?
वसंत, तुम कहां हो?
मैं बहुत दिनों से वसंत को ढूंढ रहा था। पता चला कि इस बार वो 20जनवरी को दिखा था, पर उसके बाद पता नहीं कहां चला गया। वसंत ने तो मुझसे उधार भी नहीं लिया है कि वो मुझ से मुंह चुराए। मैं किसी क्रेडिट कार्ड बनवाने वाली, उधार देने वाली, बीमा करने वाली या फिर मकान बेचने वाली, कंपनी के काल सेंटर में भी काम भी नहीं करता हूं कि वो मुझसे बचकर चले। वसंत किसी मल्टी नेशनल कंपनी में तो काम करने नहीं लग गया है। मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले युवक, कब घर आते हैं और कब जाते दफतर जाते हैं, मोहल्ले की क्या औकात, मां-बाप को पता ही नहीं चलता है। हो सकता है किसी कंपनी ने वसंत का अपने नाम पेटेंट करवा लिया हो और वो बेचारा हाथ बांधे अपने मालिक की सेवा में खड़ा हो।
पिछले वर्ष, एक दिन वसंत रास्ते में मिल गया, पर मैं पहचान नहीं सका। उसके चेहरे पर पतझड़ का वैसा ही सूखापन था जैसा सूखापन आजकल राजनीति में नैतिकता का है। उसका चेहरा किसी भूखे के पेट की तरह सख्त था और आंखों से किसी गरीब के जीवन का सूनापन झांक रहा था। होली के आसपास कौन ऐसे वसंत को पहचान सकता है? पर हो सकता है इसबार उसका चेहरा बदल गया हो। पिछले साल तो मंदी थी, इस बार तो तेजी आने वाली है।
मैंनें तय कर लिया कि इस बार तो वसंत को ढूंढ ही निकालूंगा। महात्मा बुद्ध ज्ञान की खोज में महलों का सुख त्यागकर रात को निकले थे, मैं दिन में ही, कॉलेज में पढ़ाने का सुख त्यागकर, निकल पड़ा। कालेज में पढ़ाने का सुख, महलों के सुख से कम नहीं है। आप पढ़ाते नहीं पर फिर भी माना जाता है कि आप पढ़ाते हैं।
वसंत की खोज में निकला ही था कि देखा नुक्कड़ के मकान के बाहर पत्नी अपनेे पति को तिलक करते हुए कह रही है- जाओ प्रिय, चार माह के लिए तुम देश सेवा के लिए जाओ। चाहे मेरे घर का जितना भी बजट बिगड़ जाए, तुम तो देश का बजट बनाकर आओ। राष्ट्रहित में मैं चार महीने के विरह का पतझड़ सह लूंगी।’
जहां दीये तले अंधेरा होता है, वहां दीये उपर उजाला होता है, जहां विरह का पतझड़ होता है, वहां मिलन का वसंत भी होता है। यह सोचकर मैंनें पूछा- हे देवी, आप विरह का पतझड़ क्यों सह रही हैं?’’
‘मेरे पति बजट- बाबू हैं। इन्हें देश का बजट बनाने वित्त मंत्रालय की कैद में जाना है। जब तक बजट नहीं बनेगा मेरे जीवन में विरह का पतझड़ छाया रहेगा।’
मैंनें बजट बाबू से कहा- आपकी पत्नी के जीवन में तो विरह का पतझड़ छाया होगा और आपके जीवन में बजट का वसंत छाएगा। इसका मतलब वसंत आपके साथ कमरे में बंद रहता है।’
- वसंत, हमारे साथ कमरे में! वो तो हमसे डरता है, हमारे पास पफटकता नहीं कि कहीं हम उसपर सर्विस टैक्स न लगा दें। वित्त मंत्री के तीरों से अच्छे-अच्छे घबराते हैं, वसंत किस खेत की मूली है। जाओ उसे किसी मॉल में ढंूढो।’
मैं वसंत को ढूंढने निकल पड़ा। मुझे लगा कि कहीं वो दाल और चीनी की तरह बाजार से तो गायब नहीं हो गया। पर दाल और चीनी की तो गरीब को आवश्यक्ता होती है, वसंत की नहीं, वसंत की तो अमीरों को आवश्यक्ता होती है। उनके जीवन में तो बारहमासी वसंत छाया रहता है, नहीं छाता है तो बाजार से खरीदकर छवा लेते हैं। वो सारी चीजें, जिनकी आवश्यक्ता अमीरों को होती है, वो कभी बजार से गायब नहीं होती हैं। फ्रिज, टीवी,ए सी, बड़ी-बड़ी कारें, साधन सम्पन्न कोठियां, बेईमानी, भ्रष्टाचार, अनैतिकता आदि आपने कभी गायब होते देखे हैं। ये तो बाई वन गेट वन फ्री यानी एक के साथ दूसरा मुफ्त पाओ की शैली में मिलते हैं।
आजकल बाजार से जो चीज गायब हो रही है, जिसके भाव बढ़ रहे हैं , उसका पता कृषि-मंत्री को होता है। आप तो जानते ही हैं कि हमारे मंत्री किसी जादूगर से कम नहीं होते हैं। जब मंत्री बनते हैं तो किसी सुदामा से कम नहीं होते हैं पर ऐसा जादू करते हैं कि झोपड़ी के स्थान पर महल बन जाते हैं। जादूगर चीजों को आपकी आंखों के सामने ऐसे गायब करता है कि आप देखते रह जाते हैं। और जो चीज गायब करता है, वो ही तो बता सकता है कि वो चीज गायब होकर कहां गई है। इसलिए मैं भी गायब वसंत के बारे में पता करने के लिए कृषि-मंत्री के पास चला गया।
मैंने कृषि-मंत्री से पूछा,‘‘ आपने वसंत को देखा है? कहीं मिल नहीं रहा है।’’
- कौन वसंत ?
- वसंत, अपना वसंत।’’
- अपना मराठी मानुस! उसके बारे में अप्पन खुलके बात नहीं करेगा। उसका खुल्लमखुल्ला ठेका तो बाबा साहेब के पास है, हमारा अंडरस्टैंडिंग तो बस छुपमछिपाई का...
- नहीं मराठी मानुस वाला वसंत गायब नहीं हुआ है, वो तो जैसे दाल और चीनी गायब हुए हैं...
- ओ अच्छा, वसंत नाम का कोई किसान गायब हो गया है। वो गायब नहीं हुआ होगा, उसने आत्महत्या कर ली होगी, उसे ढूंढना बंद ही कर दो।’ इस शोक में उन्होंनें बिना चीनी के चाय पी और बोले,‘देख लेना, कहीं वसंत का निर्यात तो नहीं हो गया।’’ यह कहकर उन्होंनें हाथ में क्रिकेट की बॉल पकड़ ली और उससे कैच -कैच खेलने लगे। मुझे लग गया कि यहां वसंत का पता नहीं मिलेगा, यहां तो कैच होने वाली वो बालें दिखेंगी जो स्विस बैंक में जमा करने लायक होती हैं।
मैंनें रिक्शेवाले से पूछा- ये वसंत कहां है, पता है?
- न, हम तो कल ही गांव से शहर आए हैं, कोई सवारी नहीं मिली है, आप ही बता दो कहां चलना है और जो चाहे दे दो।’
- वसंत किसी मोहल्ले का नाम नहीं है, वसंत तो मौसम का नाम है। तुमने देखा होगा, वसंत आता है तो कोयल कूकने लगती है और बागों में फूल खिल जाते हैं।’
- बाबू हम तो जब से आए हैं, कार-स्कूटरों की चिल्ल पों ही सुनी है। कोयल की कूक तो गांव में सुनी थी। बाबू जब पेट में भूख लगी हो तो फूल कहां दिखाई देते हैं। और पिफर हमें तो चारों ओर बिल्डिंग ही बिल्डिंग नजर आती हैं, इन पत्थरों में फूल कहां खिलेंगें? बाबू , आप कार-स्कूटर में बहुत बार वसंत को ढूंढते होंगे आज मेरे रिक्शे पर ही ढूंढ लें। आपका ढूंढना हो जाएगा और मेरे पेट को दो रोटी मिल जाएंगी।’
मुझे समझ आ गया कि मैंनें गलत दरवाजा खटखटा दिया है। भूखे पेट तो गोपाल का भजन नहीं हो सकता वसंत की कौन कहे। गंवई गंवार कहीं का... बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद... अनाड़ी भूखा क्या जाने शेयर बाजार का सैंसेक्स या देश की जी डी पी !
सुना है कि वसंत वी आई पी हो गया। वो आतंकवदियों की हिट लिस्ट में है। उसके चारों ओर सुरक्षा का घेरा है इसलिए वो आम जनता से नहीं मिलता है, किसी की पहुंच में नहीं है। कभी-कभी वो झोपड़ी में भी घुस जाता है तथा झोपड़ी पूरा जीवन इस आशा में बिता देती है कि वसंत फिर आएगा। जैसे दीये तले अंधेरा होता है वैसे ही वसंत के तले पतझड़ होता है और वो पतझड़ झोपड़े में छूट जाता है।
अब वसंत भी थोड़ी बहुत राजनीति जान गया है, उसने भी रूप बदल लिया है । वसंत बहरूपिया हो गया है । वसंत ऐय्यार हो गया है । वह रिमिक्स बनकर आने लगा है। वसंत जब वसंत में नहीं आ सकता तो वह दूसरे रूपों में आने लगा है । कभी वो राष्ट्रमंडल खेलों का बजट बनकर आता है, कभी हाथी की मूर्तियों के रूप में आता है, कभी हिंदी पखवाड़ा बनकर आता है और कभी...
किसी के जीवन में समस्त जीवन वसंत ही वसंत रहता है और किसी के जीवन में वसंत कभी नहीं आता है, ऐसे में वो चिल्लाता है- वसंत तुम कहां हो?
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शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2009
प्रेम जनमेजय का व्यंग्य-अंधेरे के पक्ष में उजाला
प्रिय/सम्माननीय
झिलमिलाते दीयों की जीवंत मंगल वेला में
आप सबको
दीपावली की मंगलकामनाएं
एवं हार्दिक बधाई
प्रेम जनमेजय एवं परिवार
अंधेरे के पक्ष में उजाला
प्रेम जनमेजय
मेरे मोहल्ले में अनेक चलते किस्म के लोग रहते हैं। मेरे मोहल्ले में पुलिस, न्यायालय, संसद, साहित्य, नौकरशाही आदि क्षेत्रों से जुड़े लोग रहते हैं। आप तो ज्ञानी ही हैं और जानते ही होंगें मनुष्य भी एक मशीन है और इस मशीन के पुर्जों का सही इस्तेमाल करना चलते किस्म के लोगों का ही कमाल होता है और ऐसे महापुरुषों को चलाता पुर्जा भी कहा जाता है। मेरे मोहल्ले में इन्हीं ‘चलताउ’ किस्म के लोगों का साथ निभाने और नैतिक बल देने के लिए एक चलती सड़क भी है। जैसे नारे हमें निरंतर ये भ्रम देते रहते हैं कि देश चल रहा है वैसे ही इस सड़क से लगातार फेरीवालों की आवाजाही और उनकी भांति-भांति की आवाज़ें निरंतर भ्रम देती रहती हैं कि ये सड़क बहुत चलती है। कोई रद्दी पेपर की पुकार लगाकर आपके कबाड़ से आपको लाभान्वित करने का अह्वान देता है, कोई बासी सब्जी को ताजा का भ्रम पैदा करने वाली रसघोल पुकार को जन्म देता है। कोई चाट-पकोड़ी की चटकोरी जुबान से चटपटाता है तो कोई...। मौसम के अनुसार आवाज़ें भी बदलती रहती हैं। चुनाव के मौसम में अपनी रेहड़ी पर देशसेवा लादे, देशसेवा ले लो, देशसेवा ले लो की गुहार लगाने वाले भी आते हैं। ये सभी आवाज़ें मेरी परिचित आवाज़ें हैं और मुझे परेशान नहीं करती हैं। जैसे रेल की पटरियों के पास रहने वालों को रेलगाड़ी का आना-जाना, मछली बाज़ार में रहने वालों को मछली की गंध, सरकारी दफतरों में काम करने वालों को भ्रष्टाचार, पुलिस वालों को कत्ल, वकील को झूठ आदि परेशान नहीं करते। पर उस दिन एक नई पुकार सुनकर मैं परेशान हो गया, कोई पुकार रहा था --उजाला ले लो, उजाला ले लो, बहुत सस्ता और उजला उजाला ले लो। पचास परसेंट डिस्काउंट पर उजाला ले लो।’ डिस्काउंट सेल तो बड़े-बड़े माॅल पर लगती है या उनकी देखा-देखी किसी छोटी दुकान पर। किसी फेरीवाले को मैंनें डिस्काउंट सेल लगाते हुए नहीं देखा। हां मोल-भाव करते जरूर देखा है। मोल-भाव तो हम भारतीयों की पहचान और आवश्यक्ता है। बिना मोलभाव किए माल खरीद लो तो लगता है कि लुट गए और मोलभाव करके खरीद तो लगता है कि लूट लिया। मैंनें फेरी को बुलाया और कहा- तुम्हें मैंनें पहले कभी इस मोहल्ले में नहीं देखा, तुम कौन हो और कहां से आए हो? उसने कहा- मैं उजाला हूं और स्वर्ग से आया हूं। - तुम तो सोने के भाव बिका करते थे, तुम्हारी तो पूछ ही पूछ थी, ये क्या हाल बना लिया है तुमने? तुम स्वर्ग में थे तो फिर धरती पर क्या लेने आ गए? - मैं आया नहीं, प्रभु के द्वारा धकियाया गया हूं। - क्या स्वर्ग में भी प्रजातंत्र के कारण चुनाव होने लगे हैं जो उजाले को धकियाया जा रहा है। तुम तो प्रभु के बहुत ही करीबी हुआ करते थे। साधक तो अंधेरे से लड़ने के लिए प्रभु की तपस्या करते हैं और प्रभु अंधेरे से लड़ने के लिए तुम्हारा वरदान देते हैं। तुम तो इतने ताकतवर हो कि एक दीए को तूफान से लड़वा दो, जितवा दो ं पर इस समय तो तुम ऐसे लग रहे हो जैसे प्रेमचंद की कहानियों का किसी सूदखोर बनिए के सामने खड़ा निरीह किसान या फिर आज के भारत का आत्महत्या करने वाला सरकारी आंकड़ों में चित्रित ‘खुशहाल’ किसान। - मेरी हालत तो किसान से भी बदतर है, किसान तो आत्महत्या कर सकता है, मैं तो वो भी नहीं कर सकता।’ यह कहकर वह रोने लगा। मैंनें कहा- उजाला इस तरह रोता हुआ अच्छा नहीं लगता। तुम ही कमजोर हो जाओगे तो ईमानदार मनुष्य का क्या होगा। बताओ तो सही,क्या और कैसे हुआ, तुम राजा से रंक कैसे हुए? - तुम तो जानते ही सतयुग में मेरी क्या ताकत थी। हर समय प्रभु के निकट ही रहता था। कितना विश्वास था प्रभु को मुझपर! अच्छे -अच्छे राजा मुझसे भय खाते थे। चारों ओर मेरा ही साम्राज्य था। अंधेरा मुझे देखते ही दुम दबाकर भाग जाता था। उन दिनों अंध्ेारा दीए तले रहने से भी घबराता था। मेरी ताकत के कारण मुझे बस संकेत भर करना होता था और अंधेरा किसी कोने में अपना मुंह छिपा लेता था। मेरा काम बस प्रभु के चरणों में पड़ा रहना होता था। प्रभु मुझे देखकर प्रसन्नचितदानंद होते और अपनी सृष्टि में मेरा विस्तार देखकर संतुष्ट होते। प्रभु मुझे देखकर प्रसन्न होते और मैं प्रभु को देखकर प्रसन्न होता। जैसे प्रेम में फंसा हुआ नया जोड़ा एक दूसरे को एकटक निहारता रहता है, उसे समय और स्थान का ज्ञान नहीं रहता है, वो दुनिया से कट जाता है, वैसे ही प्रभु और मैं हो गए। हम दोनों अपने प्रति परवाहकामी और संसार के प्रति बेपरवाह हो गए। अंधेरा तो इसी की तलाश में था। उसने धीरे-धीरे अपने पैर पसारने आरंभ कर दिए। एक ही स्थान पर बैठे-बैठे मुझपर चर्बी भी बहुत चढ़ गई थी। हर समय नींद-सी आई रहती थी। इधर अचानक मेरा काम बढ़ गया। समझो सरकारी नौकरी से मैं किसी मल्टीनेशनल कंपनी के चंगुल में पफंस गया। आप जानों प्रभु तो प्रभु होते हैं। निरंतर व्यस्त रहना ही प्रभु का प्रभुत्व होता है और उनके इस प्रभुत्व को उनके भक्त भोगते हैं। व्यस्त प्रभु निर्देश देते हैं और भक्त सेवक बन उनका पालन करते हैं। ज़रा-सी चूक सेवक को उसके पद से स्खलित कर देती है। मेरे साथ भी ऐसा हुआ। काम की अधिकता के कारण एक दिन मुझे उंघ आ गई और किसी ने प्रभु की प्रभुता को चुनौती दे डाली। प्रभु का नजला मुझ पर गिरा और उन्होंने मुझे श्राप दे डाला। उस श्राप के कारण मेरे अनेक टुकड़े हुए और मैं धरती पर आ गिरा। मेरे अनेक टुकड़ों मे से कोई पुलिस की गोद में गिरा, कोई वकील की गोद में गिरा, कोई नेता की गोद में गिरा, और कोई... अब मैं अपने विघटन का क्या बयान करूं...’’ ये कहकर वो फूट-फूट कर रोने लगा। उजाले को रोता देख मेरे घर के हर कोने का अंधेरा अट्टहास करने लगा। मैंनें कहा- देखो उजाले, तुम्हें रोना है तो कहीं और जाकर रोओ, वरना मेरे घर में अंध्ेारा अपना साम्राज्य स्थापित कर लेगा। मेरे घर में तुम्हारे होने का ताकतवर भ्रम बना हुआ है, उसे बना रहने दो। मुझे तुमसे सहानुभूति है, पर क्योकि अब तुम दुर्बल हो चुके हो, इसलिए तुम्हें मैं अपने घर में टिका नहीं सकता हूं। तुम्हारे रहने से मेरे घर में थोड़ा बहुत जो उजाले के होने का भ्रम है वो दूर हो जाएगा और मोहल्ले में मेरी इज्जत का भ्रम टूट जाएगा।’ उजाले ने सुबकते हुए कहा- मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है, मैं सभी जगह से इसी तरह से ठुकराया गया हूं। मेरे किसी टुकड़े को किसी ने शरण नहीं दी है। पुलिसवाले, वकील, नेता आदि सबने यही चाहा कि मैं अपने होने का भ्रम तो पैदा करूं पर खड़ा अंधेरे के पक्ष में रहूं। मेरी भूमिका अंधेरे के गवाह के रूप में रह गई है। मैं क्या करूं? - करना क्या है, वही करो जो समय की मांग है। समय की मांग बहुत बड़ी मांग होती है। इस मांग के कारण ही बाप अपनी बेटी से बलात्कार करता है, इस मांग के चलते ही बेटा कंपनी के काम को मां-बाप की आवश्यकता से अधिक प्राथमिकता देता है, इस मांग के कारण ही जनसेवक अपनी सेवा को प्राथमिकता देता है। आज समय की मांग है कि उजाला अंध्ेारे के पक्ष में खड़ा हो। तो प्यारे तुम चाहे खड़े होओ या बैठो पर मेरे यहां से फूट लो वरना तुम्हें इस घर की युवा पीढ़ी ने तुम्हें मेरे साथ देख लिया तो वो मुझे श्राप दे देगी और मैं तुम्हारी तरह फेरी लगाता अपने आपको बेच रहा हूंगा।’ उजाले ने मेरी ओर जिस निगाह से देखा उसका बयान करते हुए मेरी गर्दन शर्म के कारण झुकी जा रही थी, पर जब अस्तित्व का प्रश्न आता है तो शर्म, लज्जा, नैतिकता,आत्मस्वाभिमान आदि को तेल लेने भेजना ही पड़ता है। उजाले ने ना जाने किस दृष्टि से मुझे देखा कि वो मेरी आत्मा को बेंध गई। उजाला अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए फिर पफेरीवाल बन आवाज़े लगाने लगा। 00000000000
मंगलवार, 15 सितंबर 2009
‘हिंदी दिवस’ या ‘पंडा दिवस’
हिंदी दिवस पर नई दुनिया के 14 सितंबर अंक में प्रकाशित श्री आलोक मेहता की विशेष टिप्पणी ‘हिंदी दिवस के विरुद्ध’ पर प्रेम जनमेजय की टिप्पणी आलोक मेहता जी, ‘हिंदी दिवस’ पर आज की नई दुनिया में प्रकाशित अपकी विशेष टिप्पणी, ‘हिंदी दिवस के विरुद्ध’ से मैं पूरी तरह आपसे सहमत हूं और हिंदी के सरकारीकृत हिंदी विकास के सही चेहरे को सामने लाने के लिए आपको बधाई देता हूं। आपने सही सवाल उठाया है ‘ ... हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह और महीने के तमाशे पर करोड़ों रुपए बहाने वालों के विरुद्ध मोर्चा क्यों नहीं बनता?’ आप तो जानते ही हैं कि हमारी सामयिक व्यवस्था में वही सबल है जिसके पास अर्थ का बल है। यही कारण है कि पांच रुपए की चोरी करने वाला पुलिस के डंडे खाता है और पंाच सौ करोड़ की चोरी करने वाला किसी नायक-सा प्रचार पाता है और जेल में वी आई पी होने का सुख भोगता है। जिनके पास करोड़ों रुपए बहाने के साधन हैं उनके विरुद्ध स्वर उठाने वालों के पास बस शब्द हैं। मैं हिंदी दिवस को पंडा दिवस कहता हूं। हिंदी दिवस आते ही हिंदी के घाट पर संतों की भीड़ लग जाती है, चंदन घिसे और लगाए जाते हैं और दक्षिणा देने और लेने का स्वर्गिक सुख उठाया जाता है। आप तो जानते ही हैं कि वो चाहे श्राद्ध का पखवाड़ा हो या नवरात्र के नौ दिन, चांदी तो पंडों की ही कटती है। जैसे हमारे प्रजातंत्र की व्याख्या मूंडे जाने और मुंडवाए जाने की है वैसी ही व्याख्या इस हिंदी दिवस की भी है। जजमान मुंडे जाने पर प्रसन्न है और ... जिस चैनल पर आयोजित कार्यक्रम में आपने अपनी सहभागिता की चर्चा की है, वो कार्यक्रम मैंने भी देखा और देखने के बाद, हिंदी के प्रति अधिकांशतः अति अशुद्धतावादी कारोबारी स्वर देख/ सुन कर सर पीटने के अतिरिक्त और कुछ करने लायक न रहा। वहां का माहौल महाभारत के उस प्रसंग की याद दिला रहा था जिसमें ‘अश्वत्थामा हतो’ कहने के बाद ही ढोल पीट दिए गए थे। यहां भी ‘हिंगलिश की जय हो’ का नारा लगाया गया और ढोल पीट दिए गए जिसमें आप जैसों का स्वर नक्कारखाने में तूती-सा रह गया। हिंदुस्तानी भाषा का जोरदार समर्थन करते हुए तथा उर्दू हिंदी के आपसी सहयोग की बात करते हुए एक सुमुखी ने उदाहरण के लिए अमीर खुसरो की यह पंक्तियां अदा के साथ सुनाई-
जे हाल मिसकी मकुन तगाफुल दुराय नैना, बनाय बतियां कि ताबे हिज्रां न दारम, ऐ जां ! न लेहुं काहें लगाय छतियां मुझे नहीं लगता कि अगर वो फारसी की उन पंक्तियों को अदा के साथ न समझातीं तो वहां बैठा युवा वर्ग उसका अर्थ समझ पाता और कोई आवश्यक नहीं कि इस अदा के बाद वो समझ भी गया हो। वो भूल गई कि एक समय ये मुहावरा अपना अर्थ रखता था- हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फारसी क्या। आज फारसी का स्थान अंगे्रजी ने ले लिया है। आज का कोई भी हिंदुस्तानी युवा कितना ही पढ़ा-लिखा हो फारसी नहीं समझता है। मेरा विश्वास है कि हिंदी के अधिकांश अध्यापक तक इप पंक्तियों का अर्थ बिना किसी कुंजी के शायद ही समझा पाएं। हिंदी के प्रति या तो अत्यधिक शुद्धतावदी सोच के लोग हैं या फिर ‘अतिअशुद्धतावदी’ सोच के लोग हैं, संतुलन नहीं है। यही कारण है कि कहीं अत्यधिक शुद्धतावादी दृष्टिकोण के कारण सूखा पड़ने की स्थिति आ जाती है या फिर भाषा के बाजारवादी विकास के अतिरेक के कारण बाढ़ की स्थिति पैदा हो जाती है। इस कारण हिंदी के ऐसे रूप का समर्थन किया जाता है और राजभाषा-उद्योग के द्वारा ऐसी हिंदी का उत्पादन किया जाता है जिससे हिंदी प्रेमी को वितृष्णा हो जाए। हिंदी एक रूप वो है जहां हिंदी को बाज़ार की मांग के अनुसार उसको उसको पेश किया जाता है। हिंगलिश के पक्षधर इन सेवियों के चलते वो दिन दूर नहीं कि जब हिंदी अकादिमयों का स्थान हिंगलिश अकादमियां ले लेंगी और वहां अध्यक्ष या उपाध्यक्ष नहीं प्रेजीडेंट, वाईस प्रेजीडेंट या सी ई ओ हुआ करेंगें। अपने को बिकाउ बनाने के लिए इस तरह का संवरना है और सौंदर्य के नाम पर कमाने के लिए अपनी अस्मिता को दांव पर देनी स्थिति में हिंदी न पहुंचे तो बेहतर। हिंगलिश की आवश्यक्ता का नारा मात्र महानगरो से ही उठाया जाता है,उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश आदि हिंदी प्रदेशों का युवा ये मांग कभी नहीं उठाता है। आप तो जानते ही हैं कि स्वतंत्रता से पहले, अपना शासन चलाने के लिए और इस देश के आम आदमी से बात करने के लिए अंगे्रज कैसी कब्जीयुक्त हिंगलिश का प्रयोग किया करते थे। वैसी ही कब्जीयुक्त हिंदी का प्रयोग हिंगलिश के नाम पर हिंदी फिल्मों की रोटी खाने वाले और हिंदी के बाजार के प्रति ‘चिंतित’ काले अंग्रेज कर रहे हैं। हिंगलिश के सेवको से मेरा सवाल है कि यदि आम आदमी की भाषा हिंदी नहीं है तो ‘रामायण’ और महाभारत जैसे धरावाहिक बिना हिंगलिश के, कैसे आमजन द्वारा सराहे गए? हिंदी को बचाना है तो उसको अतिवाद से बचाना होगा। भारत में हिंदी अभी तक कागजों में ही राष्ट्र भाषा है, पर हिंदी का अपना राष्ट्र है। हिंदी का अपना विश्व है और उसका सूर्य कभी अस्त नहीं होता है। और यह सब सरकारी अनुदान से नहीं हुआ है अपितु उन असंख्य प्रवासी भारतियों के कारण हुआ है जिन्होंनें हिंदी को अपनी अस्मिता की पहचान बनाया और गंगाजल की तरह अपने जीवन में महत्व दिया। मुझे लगता है हम तब चेतेंगें जब भारत में हिंदी की अस्मिता को कोई चुनौती देगा। आपका प्रेम जनमेजय प्रेम जनमेजय की यह टिप्पणी ‘नई दुनिया’ के 16 सितंबर अंक में संपादन के साथ प्रकाशित हुई है।
बुधवार, 9 सितंबर 2009
श्री राजेंद्र यादव के नाम एक खुला पत्र
आदरणीय श्री राजेंद्र यादव जी, परनाम, साहित्य के इस तथाकथित असार संसार में ‘हंस’ को पढ़ने/देखने के, ‘जाकि रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन तैसी’ के अंदाज में अनेक अंदाज हैं। कोई साहित्यिक संत इसकी कहानियों के प्रति आकार्षित हो संत भाव से भर जाता है, कोई ‘हमारा छपयो है का’ के अंदाज में इसका अवलोकन करता है, कोई ‘डाॅक्टर’ चीर-फाड़ के इरादे से अपने हथियार भांजता हुआ संलग्न होता है, कोई नवयोद्धा,रंगरूट शब्द साहित्यिक नहीं है, सेना में भरती होने के लिए इस धर्मग्रंथ का वाचन करता है , कोई पहलवान इसे अखाड़ा मान डब्ल्यू डब्ल्यू एफ मार्का कुश्तियों का हिस्सा बनने को लालायित दंड-बैठक लगाता है और कोई विवाद-शिशु के जन्म की जानकारी के लिए तालियां बाजाता हुआ बधाईयां गाता है, आदि आदि अनादि। मैं आदि आदि अनादि कारणों से ‘हंस’ को पढ़ता हूं। ‘हंस’ एक ऐसी पत्रिका बन गई है जिसका एडिक्शन आपको चैन नहीं लेने देता है। इसके पाठकों/ अवलोकनकर्ताओं में भंांति-भांति के जीव हैं जैसे हमारे देश की संसद में होते हैं। इसमें लिखने वालों की तो एक कैटेगरी हो सकती है पर पढ़ने/देखने / सूंघने वालों की कोई कैटेगरी नहीं है। इस दृष्टि से ‘हंस’ आज के समय का ‘धर्मयुग’ है। वैसे तो आपकी, ‘मेरी-तेरी उसकी बात’ अधिकांशतः तेरी तो... करने वाली होती है और इस अर्थ में ‘प्रेरणादायक’ भी होती है कि बालक मैदाने जंग में कूद ही जाए पर सिंतंबर का आपका संपादकीय कुछ अत्यधिक ही ‘प्रेरणादायक’ है। बहुत दिनों से मैं इस जिज्ञासा को शांत करने के लिए उपयुक्त गुरु की तलाश में हूं जो मुझे बता सके कि साहित्य का हाई-कमांड कौन है और साहित्य-सेवा को ‘धर्म’ मानकर चलने वालों के ‘खलीफा’ कौन हैं जो साहित्यिक फतवे जारी करने का एकमात्र अधिकार रखते है। साहित्य की उस अदालत के न्यायमूर्ति को मैं जानना चाहता हूं जो यह तय करने की ताकत रखता है कि गुनहगार बेकसूर है और बेकसूर गुनहगार है। साहित्य की मुख्यधारा में ले जाने और इस गंगा में पवित्र-स्नान करने का ठेका किस पंडे के पास है। मुझे आपकी बात पढ़कर लगा कि आप इस दिशा में मेरा मार्गदर्शन कर सकते हैं। आपने अशोक-चक्रधर प्रसंग में लिखा है- निश्चय ही अशोक के पक्ष में उन साहित्यकारों के बयान आए हैं जो या तो दक्षिणपंथी हैं या ऐसे ढुलमुल कि हर सरकार के लिए सुविधाजनक हैं।’ अशोक के पक्ष में मैंनें भी समर्थन दिया था और मेरे लिए अपने खिलाफ जारी किया गया यह फतवा कोई मायने नहीं रखता क्योंकि मैं आपसे अपने को बेहतर जानता हूं एवं मुझे खलीफाओं के प्रमाणपत्र प्राप्त कर उन्हें फे्रम में मंडवाकर दीवारों पर टांगने का शौक नहीं। पर हुजूर आपने क्या यह बयान अपने पूरे होशो हवास में दिया है? अशोक चक्रध्र का समर्थन करने वालों में नामवर सिंह और निर्मला जैन भी थें। इन्हें आप दक्षिणपंथी मानते हैं या फिर ‘ऐसे ढुलमुल कि हर सरकार के लिए सुविधजनक हैं।’ कृपया मुझ अबोध की एक और शंका का समाधन करें- ये जो ‘हंस’ के सिंतंबर अंक के अंतिम कवर पर मध्य प्रदेश जनसंपर्क द्वारा जारी विज्ञापन प्रकाशित हुआ है, वो किसी पंथ की सरकार का है ? प्रभु आपके इस अतिरिक्त स्नेह के कारण भक्तजन कहीं फुसफसा कर ये न फुसफसाएं कि राजेंद्र जी पर उम्र अपना असर दिखाने लगी है। आप तो चिर युवा हैं और आपकी जिंदादिली के मेरे समेत अनेक प्रशंसक हैं।आपको तो अनन्य ‘नारी विमर्शो’ की चर्चा करनी है। नागार्जुन कहा करते थे कि उम्र के इस दौर में अक्सर उनकी ‘ठेपी’ खुल जाती है, कहीं आपकी भी... हे गुरुवर, इस एकलव्य को ये ज्ञान भी दें कि नामवर लोगों को आप अपने कार्यक्रमों में बुलाकर अपनी किस सदाशयता का परिचय देते हैं। कार्यक्रम में यदि नामवर जी मीठा मीठा बोल गए तो वाह! वाह! अन्यथा ‘कौन है ये नामवर के भेस में’। मुझे लगता है इस ‘दुर्घटना’ के बाद ‘शुक्रवार’ में प्रकाशित डाॅ0 कैलाश नारद के ‘असली नामवर’ को पढ़कर आपकी बांछे खिल गई होंगी जो बकौल श्रीलाल शुक्ल चाहे वे शरीर के किस हिस्से में हैं, मालूम न हों। मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूं कि नामवर जी ने जिस तरह से लौंडे शब्द का प्रयोग किया वो उनकी अपनी गरिमा के अनुकूल नहीं है। अजय नावरिया ने जिस मेहनत और लगन से ‘हंस’ के दोनों अंकों का संपादन किया है और एक मील के पत्थर को स्थापित करने का श्रम किया है वो उसकी विलक्षण प्रतिभा को प्रमाणित करता है। अजय नावरिया की इस मेहनत के सामने नामवर सिंह के शब्द झूठे हो जाते हैं। मुझे नहीं लगता कि इस मुद्दे पर नामवर सिंह को आरंभ से खारिज करने जैसा आक्रोश पैदा किए जाने की आवश्यक्ता थी। कैलाश नारद या आपकी ‘मेरी बात’ जैसी सोच का ही परिणाम है कि हिंदी के साहित्य में रचना की अपेक्षा व्यक्ति अधिक केंद्र में रहा है। इसी का परिणाम है कि एक समय हरिशंकर परसाई को और बाद में श्रीलाल शुक्ल को नाली में गिरे-पड़े किसी शराबी के रूप में चित्रित कर, सशक्त रचनाएं न लिख पाने की अपनी कुंठा का विरेचन किया जाता रहा है। आपका विरोध जायज है, जायज ही नहीं स्वाभाविक है। ये मानवीय प्रकृति है- जहां किसी अपने को बैठना चाहिए वहां कोई दूसरा बैठा हो तो विरोध जागता ही है। आप तो जानते ही हैं कि ये सरकारें, ये राजनेता किसी के सगे नहीं होते हैं। अपने शासन के एक काल में यदि एक को लाभान्वित करते हैं तो दूसरे काल में किसी अन्य को कर देते हैं। ये तो सत्ता के गलियारों की गलियां हैं जिन्हें आप भलि-भांति जानते हैं। ये वो गलियां हैं जिनमें अपनी पहियां घिस जाने की चिंता में कुंभनदास ने जाने से मना कर दिया था। विरोध-प्रदर्शन या दबाव-प्रदर्शन के लिए इस्तीफे दिए जाते हैं और इस्तीफों के चक्कर में सौदे भी तय होते हैं। पर इस घसीटमघसीटी में फतवे जारी करना किस जायज-नाजायज संतान का पालन-पोषण है? अजय नावरिया ने अशोक-चक्रधर प्रसंग को बहुत समझदारी से देखा -परखा है। उन्होंने इस नियुक्ति में न तो व्यक्तिगत आक्षेप लगाए हैं और न ही व्यक्तिगत कारण संूघने का प्रयत्न किया है। मुझे लगता है हमारी युवा पीढ़ी बेबाक होते हुए अधिक संतुलित और ईमानदार है। सादर आपका प्रेम जनमेजय
शनिवार, 5 सितंबर 2009
प्रेम जनमेजय का व्यंग्य
ओम गंदगीआय नमः
आषाढ़ का प्रथम दिवस कवि कालिदास को अच्छा लगा था, मुझे भी अच्छा लगता है और मेरे साथ-साथ पूरी दिल्ली को अच्छा लगता है। पर मेरे अच्छे लगने और कालिदास के अच्छे लगने में उतना ही अंतर है जितना अंतर एक गरीब को अमीर की तुलना में न्याय मिलने का है। अब वो चाहे आषाढ़ के बादल हों या जून की तपती दोपहरी झोपड़े में इतना दम कहां कि वो इनका मुकाबला कर ले। वैसे भी कालिदास के समय में प्रकृति प्रकृति थी, उसका अपना एक चरित्र था। ग्लोबल वार्मिंग ने प्रकृति का चरित्र ही बिगाड़ दिया है, वो अप्राकृतिक हो गई है, उसपर भरोसा नहीं किया जा सकता। जैसे ग्लोबलाईजेशन यानि भूमंडलीकरण और बाजारवाद ने आदमी को अप्राकृतिक कर दिया है। फिर भी हम भरोसा करते हैं क्योंकि हमारे पास कोई और चारा नहीं है। हम भरोसा करते हैं कि तपती जून के बाद मानसून आएगा और हमारे हालात सुध्र जाएंगें। भरोसा करना हमारी नियति है- चाहे वो आम चुनाव हो या आम का चुनाव हो, दूध-फल-सब्जी की खरीद हो- हम भरोसा करते हैं कि हमें सब कुछ मिलावट रहित मिलेगा। कालिदास के समय में आषाढ़ के बादलों में कोई मिलावट नहीं थी, उन पर भरोसा किया जा सकता था। उस समय बादल मौसम विभाग की घोषणाओं की प्रतीक्षा नहीं करते थे, आ जाते थे। आजकल तो बिजली-पानी की तरह बादल भी प्रतीक्षा करवाते हैं। आषाढ़ का पहला दिवस आ जाता है और समाज में नैतिक मूल्यों-सा शून्य आकाश अपनी नंगई पर इतराता समस्त वंचितों को बादलों के आने का भुलावा देता रहता है।
जैसे महानगरों के र्टैफिक के कारण कहीं भी समय से पहुंचना अनिश्चित हो गया है--ट्रैफिक मिला तो आप समय से पहले पहुंचकर दरिया बिछाते हैं और अगर मिल गया तो देर से पहुंचने के कारण पार्टी में बचा -खुचा खाते हैं। वैसे ही मौसम विभाग भारतीय राजनीति-सा अनिश्चित हो गया है।
पता नहीं किसी ने ये सोचा है कि नहीं अथवा मेरा ही मौलिक चिंतन है कि कालिदास ने आषाढ़ के पहले दिवस की ही क्यों चर्चा की ? कालिदास महान् कवि हो कर कितने भी खास व्यक्ति हों परंतु आषाढ़ के पहले दिवस की चर्चा कर आम आदमी हो गए। हर आम आदमी अपने ‘पहले’ की ही चर्चा करता है। अब चाहे पहली रात हो जिसे सुहाग रात भी कहते हैं, पहला प्यार हो, पहला वेतन हो, पहला बच्चा हो, पहला भ्रष्टाचार हो यानि दूसरे को छोड़कर जो भी पहला होता है आम आदमी उसकी चर्चा अवश्य करता है। कालिदास ने भी आम आदमी की तरह आषाढ़ की चर्चा की। आप तो जानते ही हैं कि हर खास आदमी के अंदर आम आदमी और हर आम आदमी के अंदर खास आदमी होता है। हर पहली चीज खास होती है पर दूसरी -तीसरी होते ही आम हो जाती है और झुग्गी-झोपड़ी में रहती है। पहली रात दूसरी-तीसरी आदि के बाद क्या होती है इसे आजकल के शादी-शुदा तो क्या कुंवारे भी जानते ही हैं। आषाढ़ के पहले बादलों के बाद जो बरसता है उसके कारण नदी-नाले भर जाते हैं, नगर-निगम की कार्यकुशलता के कारण बदबू और गंदगी में सूअर खुलकर टवैंटी-टवैंटी खेलते हैं और मलेरिया ढेंगू आदि की भीड़ के सामने आम चुनाव की रैलियां भी शरमा जाती हैं। सड़कें गड्ढों में बदल जाती हैं और गड्ढे तलाबों में बदल जाते हैं। अब ऐसे पवित्र वातावरण में कोई आम आदमी नहीं रहना चाहेगा तो कालिदास जैसा खास आदमी कैसे रहता ? तो भक्तों, कालिदास ने इसलिए आषाढ़ के पहले दिवस का ही अह्वान किया और उनके लिए अपनी काव्य-प्रतिभा का सदुपयोग किया। परंतु हुई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया वाली बरसात में दिल्ली या मुम्बई की नगर निगम की कृपा देखते तो बादलों को कहते- जाओ बादल । हमें तो जो नहीं है वो चाहिए- अति सर्दी में गर्मी चाहिए, अति गर्मी में ठंडी चाहिए, अति सूखे में बरसात चाहिए और अति बरसात में सूखा चाहिए। हमने प्रकृति का संतुलन बिगाड़ा है पर हम प्रकृति से संतुलन की अपेक्षा करते हैं।
मेरे मोहल्ले में भी एक आध्ुनिक कालिदास रहते हैं। कालिदास आषाढ़ के पहले दिन की प्रतीक्षा करते थे , हमारे कालिदास कवि सम्मेलन की रात की प्रतीक्षा करते हैं। हमारे कालिदास में इतना कवि -तेज है कि यदि पा्रचीनकालीन कालिदास उन्हें देख भर लें तो कविता करना छोड़ दें। प्राचीनकालीन कालिदास हमारे कालिदास की तुलना में उन्नीस तो क्या शून्य भी नहीं ठहरते हैं। कहां हमारे कालिदास को एक ही कविता को बीसियों मंच पर सुनाकर एक-एक रात के हजारों मिलते हैं वहां प्राचीनकालीन ने इतना लिख कर ‘कितना’ भी नहीं पाया होगा। हमारे इन कवि का नाम है कवि घूमड़। तो हमारे कवि घूमड़ रात भर एक पार्टी में व्यस्त थे। पार्टी इन्होंनें अपने घर में कवि कर्मा को दी थी, अपनी आने वाली रातों को कवि सम्मेलनों से सुहागन बनाने के लिए। पार्टी वही अच्छी होती है जिसमें दारू भी अच्छी हो और अच्छी दारू पी ही तो नींद भी अच्छी आती है। ऐसी ही अच्छी नींद लेने के बाद कवि घूमड़ ने अपनी बाॅलकनी का दरवाज़ा खोला । अपने वातानुकूलित कमरे से बाहर बाॅलाकोनी में निकलकर जैसे ही सुबह की अंगड़ाई ली तो बिना किसी निमंत्रण के आषाढ़ की ;शायदद्ध पहली बूंद ने उनका चुंबन ले लिया। अब चाहे हास्य-व्यंग्य का कवि हो, या पिफर गीतकार अथवा गज़लकार , मन में सबके मयूर होता ही जो बिना लिफाफे के भी नाचता है। मन -मयूर ने नाचने के लिए आकाश की ओर देखा तो पाया कि नाचने के लिए पर्याप्त बादल हैं। कवि घूमड़ के मन -मयूर ने अभी अपने पंख खोलने की प्रक्रिया आरंभ ही की थी कि उनकी नज़र सामने पड़ गई। सामने का दृश्य मन- मयूर के नृत्य के साथ कूकने का भी था। मोर ने अपनी मेारनी को आवाज़ दी। मेारनी उस समय अभी तक काम वाली बाई के न आने के कारण, रात की पार्टी के बरतनों से भरे सिंक को देख रही थी और कोई भी गिलास सापफ न मिलने के कारण ओक से ही पानी पी रही थी। मोर की पुकार सुनकर मोरनी को लगा कि मोर को अवश्य ही कोई कविता सूझी होगी। मोरनी जानबूझकर देरी कर ही रही थी मोर ने पुनः पुकारा- अरे देखो तो सही बाहर कितना अच्छा मौसम है... और रात ही रात में जो चमत्कार हुआ है उसे तो देखो।’ मोरनी तो विवाह होने के बाद से अकेली रात के उसी चमत्कार को जानती है जब मोर के लिए केवल कवि सम्मेलन की रात ही महत्वपूर्ण होती है और दूसरी रातें...।
इससे पहले कि मोर जी झुंझला के तीसरी पुकार लगाएं मोरनी ने अपना गाउन संभाला और बाॅलकोनी की ओर प्रस्थान किया। ठंडी हवा के झोंके ने विश्वास दिला दिया कि आज कवि जी दूर की नहीं हांक रहे हैं, मौसम वास्तव में अच्छा है। बाॅलकनी में पहुंचकर मोरनी ने कहा - वाह, कितने घने बादल हैं आसमान में। पकोड़े बनाउं?’
- सामने तो देखो तुम पकोड़ों के साथ मालपुए भी बनाओगी।’
- सामने...!
-- जी हां सामने की सारी झुग्गियां रात ही रात में साफ कर दी गई हैं। हमारे सामने से गंदगी साफ हो गई है। अब हमारे फलैट की कीमत दोगुनी हो जाएगी। इन झुग्गी- झोपड़ी वालों के कारण कितनी गंदगी थी, कभी बाॅलकनी में बैठकर चाय तक नहीं पी सकते थे । ’
मेारनी ने देखा कि मोर दूसरी बार भी हांक नहीं रहा था यथार्थ का वर्णन कर रहा था। सामने की झुग्गियों पर बुलडोजर पिफर चुका था। झोपड़ियों में पड़ा सामान बरसात की रिमझिम पफुहारों का आनंद ले रहा था। कुछ अध्नंगे बच्चे इध्र -उध्र दौड़ रहे थे और कुछ मंा की गोद में बैठे मां का लटका मुंह निहार रहे थे। पुरुष अपना बचा खुचा समेट रहे थे। रात को हुई बरसात ने उनका भी दिल तोड़ दिया था और टूटे दिल की समस्या भी बड़ी हो ही जाती है।
- जानती हो कपूर साहब बता रहे थे कि पहले झुग्गियां टूटती थीं तो एक दो दिन बाद फिर से बन जाती थीं। पर अब तो जो भी टूट रही हैं, दोबारा नहीं बनेंगी। इनका नंबर भी बहुत दिनों बाद आया है।’ मोर ने अपने पंख फैलाकर मोरनी को उनमे समेटते हुए कहा।
मोरनी भी चहकी- ये तो बहुत ही अच्छा हुआ। सच बहुत ही गंद हो गया था समाने। अब ये लोग कहां जाएंगें?
- भाड़ में जाएं, हमारी बला से। यहां से तो गंदगी हटी।
- पर चंदा, हमारी काम वाली भी तो सामने रहती है। लगता है आज तो वो नहीं आएगी।
- अरे हां, इन हालातों में तो ये ही लग रहा है कि वो नहीं आएगी।
- लो सुबह- सुबह आ गई एक और मुसीबत, ढेर सारे बर्तन पड़े है पार्टी के, घर गंदा अलग पड़ा है, अब कौन करेगा सफाई?
-- किसी और को बुला लो, सौ पचास देकर करा लेना।
- किस और को बुलाउफं? सामने देख तो रहे हो, सभी की झुग्गियां टूटी हैं... मुझे तो पल भर के लिए आराम नहीं है। खुद तो रात को पार्टी के मजे लेते हैं, खूब शराबें पीते हैं और सुबह के लिए मुसीबत मेरे लिए छोड़ देते हैं।
-- घर का काम मुसीबत है क्या? सभी औरतें घर का काम करती हैं। तुम्हें तो थोड़ा-सा भी काम करना पड़े तो नानी याद आने लगती है।
-- नानी याद आती है तुम्हें। एक गिलास पानी का भी लेना हो तो कभी उठकर नहीं लेते हो। औरों के पति अपनी पत्नियों का घर के काम में हाथ बटांते हैं और तुम...। चलो आज मेरे साथ बर्तन साफ करने में मदद करो।
- हो सकता है चंदा आ ही जाए। उसे भी तो रोजी-रोटी चाहिए।’ एक कुटिल मुस्कान के साथ मेार जी ने कहा,‘ अभी तो उसने पगार भी नहीं ली है।’
पर मोरनी बहकावे में नही आई और उसने दबंग होकर कहा-- पर आज तो वो आने से रही। बर्तन थोड़ी देर और पड़े रहे तो बदबू मारने लगेंगे। बहाने मत मारो और बर्तन साफ करने में मदद करो।
-- तुम... तुम एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि से जूठे बर्तन साफ करने को कह रही हो... होश में तो हो।
-- मैं होश में ही हूं और कवि जी ये जूठे बर्तन आपकी ही शराब पीकर बेहोशी का नतीजा हैं। मैं आज अकेले तो इन्हें हाथ लगाने से रही।
- तो पड़े रहने दो उन्हें ऐसे ही। ’
मेार मोरनी अब गली के कुत्तों की तरह एक दूसरे पर भौंक रहे थे। गंदगी घर में चारों ओर बिखरी हुई थी। और कवि घूमड़, मूड ठीक करने के लिए नब्बे नम्बर का पान खाने चल दिए।
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आषाढ़ का प्रथम दिवस कवि कालिदास को अच्छा लगा था, मुझे भी अच्छा लगता है और मेरे साथ-साथ पूरी दिल्ली को अच्छा लगता है। पर मेरे अच्छे लगने और कालिदास के अच्छे लगने में उतना ही अंतर है जितना अंतर एक गरीब को अमीर की तुलना में न्याय मिलने का है। अब वो चाहे आषाढ़ के बादल हों या जून की तपती दोपहरी झोपड़े में इतना दम कहां कि वो इनका मुकाबला कर ले। वैसे भी कालिदास के समय में प्रकृति प्रकृति थी, उसका अपना एक चरित्र था। ग्लोबल वार्मिंग ने प्रकृति का चरित्र ही बिगाड़ दिया है, वो अप्राकृतिक हो गई है, उसपर भरोसा नहीं किया जा सकता। जैसे ग्लोबलाईजेशन यानि भूमंडलीकरण और बाजारवाद ने आदमी को अप्राकृतिक कर दिया है। फिर भी हम भरोसा करते हैं क्योंकि हमारे पास कोई और चारा नहीं है। हम भरोसा करते हैं कि तपती जून के बाद मानसून आएगा और हमारे हालात सुध्र जाएंगें। भरोसा करना हमारी नियति है- चाहे वो आम चुनाव हो या आम का चुनाव हो, दूध-फल-सब्जी की खरीद हो- हम भरोसा करते हैं कि हमें सब कुछ मिलावट रहित मिलेगा। कालिदास के समय में आषाढ़ के बादलों में कोई मिलावट नहीं थी, उन पर भरोसा किया जा सकता था। उस समय बादल मौसम विभाग की घोषणाओं की प्रतीक्षा नहीं करते थे, आ जाते थे। आजकल तो बिजली-पानी की तरह बादल भी प्रतीक्षा करवाते हैं। आषाढ़ का पहला दिवस आ जाता है और समाज में नैतिक मूल्यों-सा शून्य आकाश अपनी नंगई पर इतराता समस्त वंचितों को बादलों के आने का भुलावा देता रहता है।
जैसे महानगरों के र्टैफिक के कारण कहीं भी समय से पहुंचना अनिश्चित हो गया है--ट्रैफिक मिला तो आप समय से पहले पहुंचकर दरिया बिछाते हैं और अगर मिल गया तो देर से पहुंचने के कारण पार्टी में बचा -खुचा खाते हैं। वैसे ही मौसम विभाग भारतीय राजनीति-सा अनिश्चित हो गया है।
पता नहीं किसी ने ये सोचा है कि नहीं अथवा मेरा ही मौलिक चिंतन है कि कालिदास ने आषाढ़ के पहले दिवस की ही क्यों चर्चा की ? कालिदास महान् कवि हो कर कितने भी खास व्यक्ति हों परंतु आषाढ़ के पहले दिवस की चर्चा कर आम आदमी हो गए। हर आम आदमी अपने ‘पहले’ की ही चर्चा करता है। अब चाहे पहली रात हो जिसे सुहाग रात भी कहते हैं, पहला प्यार हो, पहला वेतन हो, पहला बच्चा हो, पहला भ्रष्टाचार हो यानि दूसरे को छोड़कर जो भी पहला होता है आम आदमी उसकी चर्चा अवश्य करता है। कालिदास ने भी आम आदमी की तरह आषाढ़ की चर्चा की। आप तो जानते ही हैं कि हर खास आदमी के अंदर आम आदमी और हर आम आदमी के अंदर खास आदमी होता है। हर पहली चीज खास होती है पर दूसरी -तीसरी होते ही आम हो जाती है और झुग्गी-झोपड़ी में रहती है। पहली रात दूसरी-तीसरी आदि के बाद क्या होती है इसे आजकल के शादी-शुदा तो क्या कुंवारे भी जानते ही हैं। आषाढ़ के पहले बादलों के बाद जो बरसता है उसके कारण नदी-नाले भर जाते हैं, नगर-निगम की कार्यकुशलता के कारण बदबू और गंदगी में सूअर खुलकर टवैंटी-टवैंटी खेलते हैं और मलेरिया ढेंगू आदि की भीड़ के सामने आम चुनाव की रैलियां भी शरमा जाती हैं। सड़कें गड्ढों में बदल जाती हैं और गड्ढे तलाबों में बदल जाते हैं। अब ऐसे पवित्र वातावरण में कोई आम आदमी नहीं रहना चाहेगा तो कालिदास जैसा खास आदमी कैसे रहता ? तो भक्तों, कालिदास ने इसलिए आषाढ़ के पहले दिवस का ही अह्वान किया और उनके लिए अपनी काव्य-प्रतिभा का सदुपयोग किया। परंतु हुई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया वाली बरसात में दिल्ली या मुम्बई की नगर निगम की कृपा देखते तो बादलों को कहते- जाओ बादल । हमें तो जो नहीं है वो चाहिए- अति सर्दी में गर्मी चाहिए, अति गर्मी में ठंडी चाहिए, अति सूखे में बरसात चाहिए और अति बरसात में सूखा चाहिए। हमने प्रकृति का संतुलन बिगाड़ा है पर हम प्रकृति से संतुलन की अपेक्षा करते हैं।
मेरे मोहल्ले में भी एक आध्ुनिक कालिदास रहते हैं। कालिदास आषाढ़ के पहले दिन की प्रतीक्षा करते थे , हमारे कालिदास कवि सम्मेलन की रात की प्रतीक्षा करते हैं। हमारे कालिदास में इतना कवि -तेज है कि यदि पा्रचीनकालीन कालिदास उन्हें देख भर लें तो कविता करना छोड़ दें। प्राचीनकालीन कालिदास हमारे कालिदास की तुलना में उन्नीस तो क्या शून्य भी नहीं ठहरते हैं। कहां हमारे कालिदास को एक ही कविता को बीसियों मंच पर सुनाकर एक-एक रात के हजारों मिलते हैं वहां प्राचीनकालीन ने इतना लिख कर ‘कितना’ भी नहीं पाया होगा। हमारे इन कवि का नाम है कवि घूमड़। तो हमारे कवि घूमड़ रात भर एक पार्टी में व्यस्त थे। पार्टी इन्होंनें अपने घर में कवि कर्मा को दी थी, अपनी आने वाली रातों को कवि सम्मेलनों से सुहागन बनाने के लिए। पार्टी वही अच्छी होती है जिसमें दारू भी अच्छी हो और अच्छी दारू पी ही तो नींद भी अच्छी आती है। ऐसी ही अच्छी नींद लेने के बाद कवि घूमड़ ने अपनी बाॅलकनी का दरवाज़ा खोला । अपने वातानुकूलित कमरे से बाहर बाॅलाकोनी में निकलकर जैसे ही सुबह की अंगड़ाई ली तो बिना किसी निमंत्रण के आषाढ़ की ;शायदद्ध पहली बूंद ने उनका चुंबन ले लिया। अब चाहे हास्य-व्यंग्य का कवि हो, या पिफर गीतकार अथवा गज़लकार , मन में सबके मयूर होता ही जो बिना लिफाफे के भी नाचता है। मन -मयूर ने नाचने के लिए आकाश की ओर देखा तो पाया कि नाचने के लिए पर्याप्त बादल हैं। कवि घूमड़ के मन -मयूर ने अभी अपने पंख खोलने की प्रक्रिया आरंभ ही की थी कि उनकी नज़र सामने पड़ गई। सामने का दृश्य मन- मयूर के नृत्य के साथ कूकने का भी था। मोर ने अपनी मेारनी को आवाज़ दी। मेारनी उस समय अभी तक काम वाली बाई के न आने के कारण, रात की पार्टी के बरतनों से भरे सिंक को देख रही थी और कोई भी गिलास सापफ न मिलने के कारण ओक से ही पानी पी रही थी। मोर की पुकार सुनकर मोरनी को लगा कि मोर को अवश्य ही कोई कविता सूझी होगी। मोरनी जानबूझकर देरी कर ही रही थी मोर ने पुनः पुकारा- अरे देखो तो सही बाहर कितना अच्छा मौसम है... और रात ही रात में जो चमत्कार हुआ है उसे तो देखो।’ मोरनी तो विवाह होने के बाद से अकेली रात के उसी चमत्कार को जानती है जब मोर के लिए केवल कवि सम्मेलन की रात ही महत्वपूर्ण होती है और दूसरी रातें...।
इससे पहले कि मोर जी झुंझला के तीसरी पुकार लगाएं मोरनी ने अपना गाउन संभाला और बाॅलकोनी की ओर प्रस्थान किया। ठंडी हवा के झोंके ने विश्वास दिला दिया कि आज कवि जी दूर की नहीं हांक रहे हैं, मौसम वास्तव में अच्छा है। बाॅलकनी में पहुंचकर मोरनी ने कहा - वाह, कितने घने बादल हैं आसमान में। पकोड़े बनाउं?’
- सामने तो देखो तुम पकोड़ों के साथ मालपुए भी बनाओगी।’
- सामने...!
-- जी हां सामने की सारी झुग्गियां रात ही रात में साफ कर दी गई हैं। हमारे सामने से गंदगी साफ हो गई है। अब हमारे फलैट की कीमत दोगुनी हो जाएगी। इन झुग्गी- झोपड़ी वालों के कारण कितनी गंदगी थी, कभी बाॅलकनी में बैठकर चाय तक नहीं पी सकते थे । ’
मेारनी ने देखा कि मोर दूसरी बार भी हांक नहीं रहा था यथार्थ का वर्णन कर रहा था। सामने की झुग्गियों पर बुलडोजर पिफर चुका था। झोपड़ियों में पड़ा सामान बरसात की रिमझिम पफुहारों का आनंद ले रहा था। कुछ अध्नंगे बच्चे इध्र -उध्र दौड़ रहे थे और कुछ मंा की गोद में बैठे मां का लटका मुंह निहार रहे थे। पुरुष अपना बचा खुचा समेट रहे थे। रात को हुई बरसात ने उनका भी दिल तोड़ दिया था और टूटे दिल की समस्या भी बड़ी हो ही जाती है।
- जानती हो कपूर साहब बता रहे थे कि पहले झुग्गियां टूटती थीं तो एक दो दिन बाद फिर से बन जाती थीं। पर अब तो जो भी टूट रही हैं, दोबारा नहीं बनेंगी। इनका नंबर भी बहुत दिनों बाद आया है।’ मोर ने अपने पंख फैलाकर मोरनी को उनमे समेटते हुए कहा।
मोरनी भी चहकी- ये तो बहुत ही अच्छा हुआ। सच बहुत ही गंद हो गया था समाने। अब ये लोग कहां जाएंगें?
- भाड़ में जाएं, हमारी बला से। यहां से तो गंदगी हटी।
- पर चंदा, हमारी काम वाली भी तो सामने रहती है। लगता है आज तो वो नहीं आएगी।
- अरे हां, इन हालातों में तो ये ही लग रहा है कि वो नहीं आएगी।
- लो सुबह- सुबह आ गई एक और मुसीबत, ढेर सारे बर्तन पड़े है पार्टी के, घर गंदा अलग पड़ा है, अब कौन करेगा सफाई?
-- किसी और को बुला लो, सौ पचास देकर करा लेना।
- किस और को बुलाउफं? सामने देख तो रहे हो, सभी की झुग्गियां टूटी हैं... मुझे तो पल भर के लिए आराम नहीं है। खुद तो रात को पार्टी के मजे लेते हैं, खूब शराबें पीते हैं और सुबह के लिए मुसीबत मेरे लिए छोड़ देते हैं।
-- घर का काम मुसीबत है क्या? सभी औरतें घर का काम करती हैं। तुम्हें तो थोड़ा-सा भी काम करना पड़े तो नानी याद आने लगती है।
-- नानी याद आती है तुम्हें। एक गिलास पानी का भी लेना हो तो कभी उठकर नहीं लेते हो। औरों के पति अपनी पत्नियों का घर के काम में हाथ बटांते हैं और तुम...। चलो आज मेरे साथ बर्तन साफ करने में मदद करो।
- हो सकता है चंदा आ ही जाए। उसे भी तो रोजी-रोटी चाहिए।’ एक कुटिल मुस्कान के साथ मेार जी ने कहा,‘ अभी तो उसने पगार भी नहीं ली है।’
पर मोरनी बहकावे में नही आई और उसने दबंग होकर कहा-- पर आज तो वो आने से रही। बर्तन थोड़ी देर और पड़े रहे तो बदबू मारने लगेंगे। बहाने मत मारो और बर्तन साफ करने में मदद करो।
-- तुम... तुम एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि से जूठे बर्तन साफ करने को कह रही हो... होश में तो हो।
-- मैं होश में ही हूं और कवि जी ये जूठे बर्तन आपकी ही शराब पीकर बेहोशी का नतीजा हैं। मैं आज अकेले तो इन्हें हाथ लगाने से रही।
- तो पड़े रहने दो उन्हें ऐसे ही। ’
मेार मोरनी अब गली के कुत्तों की तरह एक दूसरे पर भौंक रहे थे। गंदगी घर में चारों ओर बिखरी हुई थी। और कवि घूमड़, मूड ठीक करने के लिए नब्बे नम्बर का पान खाने चल दिए।
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सोमवार, 8 जून 2009
तपन
जब जून का महीना आता है
अपने प्राकतिक रूप में
अपने पूर्ण अस्तित्व के साथ
सपरिपवार,
दिल्ली में लोग तपते
या जहां कहीं भी दिल्ली है
लोग तपते हैं
भीष्ण गर्मी की तपन से ।
लोग तपते हैं
मैं भी तपता हूं
पर, एक और अगन से।
ये अगन है अभाव की
ये अगन है खालीपन की
ये अगन है अपना बहुत कुछ बहुमूल्य खोने की।
मैंनें अपनी माॅ को
इसी मौसम में खोया है।
शायद इसलिए
आठ जून को जब आठ बजते हैं
मौसम कैसा भी हो
सुहावना या तपता हुआ
एक आग से मुझे भिगो जाता है
मेरे अंदर तपता अभाव जगा जाता है।
पर ना जाने क्यों
ये सब मुझे बेचैन तो करता हैं
पर असंतुलित नहीं।
जब जून का महीना आता है
अपने प्राकतिक रूप में
अपने पूर्ण अस्तित्व के साथ
सपरिपवार,
दिल्ली में लोग तपते
या जहां कहीं भी दिल्ली है
लोग तपते हैं
भीष्ण गर्मी की तपन से ।
लोग तपते हैं
मैं भी तपता हूं
पर, एक और अगन से।
ये अगन है अभाव की
ये अगन है खालीपन की
ये अगन है अपना बहुत कुछ बहुमूल्य खोने की।
मैंनें अपनी माॅ को
इसी मौसम में खोया है।
शायद इसलिए
आठ जून को जब आठ बजते हैं
मौसम कैसा भी हो
सुहावना या तपता हुआ
एक आग से मुझे भिगो जाता है
मेरे अंदर तपता अभाव जगा जाता है।
पर ना जाने क्यों
ये सब मुझे बेचैन तो करता हैं
पर असंतुलित नहीं।
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